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रावण के पास सब कुछ था, फिर भी हार गया! रामचरितमानस की यह चौपाई देती है बड़ी सीख

Published: Mon, 19 Oct 2026 12:00 PM (IST)

विजयदशमी पर रावण का पुतला जलाना तो एक परंपरा है, किंतु यदि मनुष्य भगवान के दिए गए सामर्थ्य का उपयोग ...और पढ़ें

रामचरितमानस से सीख: रावण की हार और रामभक्ति का महत्व

रामचरितमानस से सीख: रावण की हार और रामभक्ति का महत्व

HighLights

  1. रामचरितमानस का महामंत्र: राम विमुख व्यक्ति की संपत्ति व्यर्थ होती है

  2. मंदोदरी और विभीषण की भक्ति ने सही मार्ग दिखाया

  3. विजयादशमी पर आंतरिक बुराइयों को मिटाने का महत्वपूर्ण संदेश

स्वामी मैथिलीशरण, (अध्यक्ष-संस्थापक, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाई रही पाई बिनु पाई।।

श्रीरामचरितमानस का महामंत्र है-रामविमुख व्यक्ति की संपत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है। इस मंत्र को लंका में केवल मंदोदरी और विभीषण ने समझा; विजयदशमी के अवसर पर आज देश के लिए महत्वपूर्ण संदेश है इस छोटी पंक्ति में। श्रीरामचरितमानस में पातिव्रत्य और रामभक्ति का उदाहरण हैं रावण की पत्नी मंदोदरी-

काल बिबस पति कहा न माना।
अग जग नाथु मनुज करि जाना।।

रावण काल विवश हो गया था, इसलिए शुद्धबुद्धि मंदोदरी का सुपवित्र अनुरोध उसे स्वीकार नहीं हुआ। काल किसी के पीछे डंडा लेकर नहीं घूमता। वह तटस्थ रहता है, पर जिसकी बुद्धि अशुद्ध हो जाती है, उसके जीवन से धर्म, बल, बुद्धि, विचार का विपर्यय हो जाता है और अंत में वह सारी विशेषताएं होते हुए भी विनाश को प्राप्त होता है। यह विजयादशमी इसलिए है कि अंत में विजय मंदोदरी और विभीषण की भक्ति की हुई, जो साररूप श्रीराम को हृदय में धारण किए हुए थे।

मंदोदरी ने रावण के शव के समक्ष खड़े होकर कहा कि भगवान श्रीराम के समान कृपा का समुद्र संसार में दूसरा कोई नहीं है, जिन्होंने तुम्हें वह गति दी, जो मुनि-योगियों के लिए कठिन साधना के पश्चात भी दुष्कर होती है। रावण की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी मंदोदरी के पातिव्रत्य और ईश्वर निष्ठा को देखकर हृदय नतमस्तक हो जाता है। वाणी का ऐसा सार्थक विन्यास। किसी धर्मनिष्ठ पत्नी द्वारा कहा जाना अलग तरह का अनुभव है। पति की मृत्यु के पश्चात मंदोदरी ने रावण की महिमा, शक्ति, ज्ञान, शौर्य तथा पराक्रम का अभूतपूर्व बखान किया, फिर वह प्रभु श्रीरामचंद्र के चरणों में अपनी अखंड भक्ति की पूर्णाहुति देकर वचन यज्ञ को संपूर्ण करती हैं। ज्ञेय राम को जानकर वे स्वयं ज्ञाता सिद्ध हो जाती हैं। रावण वध के प्रसंग में मंदोदरी भक्ति की वह प्रवहमान सरिता बन गईं, जो रामसमुद्र में होने वाला विलय ही है।

लंका में रावण की पटरानी मंदोदरी स्वधर्म के रूप में पातिव्रत्य धर्म के अनुरूप तो रावण की सेवा करती रहीं, किंतु पातिव्रत्य धर्म का लाभ उस सीमा तक अधर्म को मिलने लगा, जब उनके पति ने माता सीता का हरण कर उन्हें मंदोदरी का विकल्प बनाना चाहा। जब धर्म की अधिक हानि होने लगी, तब मंदोदरी ने धर्मरक्षा के लिए स्वयं को ईश्वर धर्म में स्थित कर लिया। यही विवेक है, जो केवल भक्ति और कृपा से ही संभव है।

दशमी तिथि को रावण के पुतले जलाने की तो एक परंपरा है, जो वार्षिकोत्सव का रूप ले चुकी है। यह होना भी चाहिए, क्योंकि दसवीं का पूर्वपक्ष बहुत उज्ज्वल है, जो नवरात्र में होने वाली रामलीला है। श्रीराम की लीला तथा नवरात्र की संपूर्णता ही रावणत्व के समापन से होती है। आज देश को विवेक में स्थित रहना है। बुराई कभी हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में आती है, कभी शिशुपाल व दंतवक्र के रूप में तो कभी रावण और कुंभकर्ण के रूप में आती है। हर काल में ईश्वर का अवतार भक्तों की रक्षा करता रहा है, किंतु यह स्मरण रहना आवश्यक है कि हर युग में भगवान को भक्तों का सहयोग मिला है। बुराई मिटाने के लिए हम भगवान का सहयोग देने के लिए केवल इतना करें कि ईश्वर ने बिना पक्षपात के जो हमें दिया है, उसका सदुपयोग करें।

समय पर विश्वास करें और समय से पुरुषार्थ करें। भगवान के द्वारा प्रदत्त इंद्रियों, जलवायु, पंचत्व और विवेक के द्वारा अपने चरम लक्ष्य ईश्वर को समर्पित कर प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह मुक्त रहें। जितनी सभ्यता, समय पालन और श्रेष्ठ नागरिकता का प्रदर्शन हम विदेश में जाकर करते हैं, वह देश में भी करें। अपने और अपने देश के प्रति समर्पित और गंभीर रहें। उपलब्ध साधनों का रावण ने दुरुपयोग किया और विभीषण ने सदुपयोग। एक का पुतला जलाया जाता है और दूसरा रामराज्य के पूजन के दिन भगवान की झांकी में एक पार्षद होता है। महत्वपूर्ण पुतला जलाना नहीं, महत्वपूर्ण है विभीषण और मंदोदरी बनना।

भगवान को भक्त के और भक्त को भगवान के सहयोग की आवश्यकता होती है। यह विवेक सत्संग के अंतरंग में पैठकर उसके मर्म को समझकर ही प्राप्त हो सकता है। मंदोदरी ने कहा-

अहइ नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्ह भगवान।।

जिसके बल से पृथ्वी कांपती थी, अग्नि-सूर्य-चंद्रमा जिस रावण के तेज के समक्ष न्यून लगते थे, वही आज तेजहीन होकर पृथ्वी पर पड़ा है? विधाता की बनाई सृष्टि को तुम अपने अहंकार के कारण अपने वश में किए हुए थे, पर विधाता ने वह भी स्वीकार कर लिया, किंतु अपनी सीमा और भगवान की असीमता को न समझ पाने के कारण इस स्थिति में आ गए कि तुम्हारी उन पुरुषार्थी भुजाओं को भगवान की कृपा का आश्रय न मिलने के कारण गीदड़ खा रहे हैं। काल ही बलशाली होता है। तुमने भगवान को मनुष्य माना और परम पतिव्रता सीता को स्त्री माना।

जान्यो मनुज सकरि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनाअयं।।

रावण का स्वभाव था दूसरों से द्रोह करना। परद्रोही, हिंसक, प्रतिस्पर्धायुक्त व्यक्ति वर्तमान को अपने हाथ में कर लेना चाहता है, किंतु उसको यह ज्ञान नहीं रह जाता है कि मनुष्य की शक्ति, क्षमता और पुरुषार्थ क्षणभंगुर है। जिन श्रीराम के नाम के प्रताप से समुद्र में पत्थर तैर गए, उनको छोड़कर जो अन्यत्र भटकते हैं, गोस्वामी जी उन्हें मतिमंद कहते हैं। हनुमान जी ने लंका जाकर रावण से यही कहा था कि राम विमुख होकर संसार की सारी संपदा पा लेने के बाद भी न पाने की तरह होती है। राम की भक्ति ही वह भक्तिमणि है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता है।

राम भगतिमनि उर बस जाके।
दुख लबलेस न सपनेहुं ताके।।

विभीषण का राजतिलक कराने के लिए भगवान ने अंगद, लक्ष्मण, जांबबान, नल, नील, सुग्रीव, सारे नीतिनिपुण लोगों को लंका भेजा। हनुमान जी से कहा- जाकर सीता को समाचार दे दो और विभीषण के मार्गदर्शन में सीता को मेरे पास ले आओ। सीता जी ने हनुमान जी को आशोक वाटिका में दोबारा देखा। उन्होंने हनुमान जी से कहा- पुत्र! मैं तुम्हें आज क्या दे दूं? हनुमान जी बोले- मां! आपको प्रसन्न देखकर तो मैंने त्रिलोक का राज्य पा लिया। माने भूत, वर्तमान और भविष्य आपने सब आनंदमय कर दिया। आपने मुझे अपना पुत्र स्वीकार कर लिया। रावण यदि माता के रूप में सीता जी को स्वीकार कर लेता तो सीता जी तो उसको भी पुत्र स्वीकार कर लेतीं।

रावण का पुतला जलना तो परंपरा है, क्योंकि वह हर वर्ष जलता है और हर वर्ष बनता है, किंतु यदि मनुष्य केवल भगवान के दिए गए सामर्थ्य का उपयोग समाज सेवा, दूसरों के दुख हरने और पुरुषार्थ के द्वारा भिक्षावृत्ति तथा दीनता से ऊपर उठ जाए तो भारत में तो रामराज्य सबसे पहले हुआ था और फिर हो सकता है। हमें अपनी मूल परंपरा का सम्मान करना है। चरित्र का संदेश ही सबसे बड़ा संदेश होता है। भगवान श्रीराम ने वही संदेश दिया और रावण वह नहीं दे सका।