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आज के युवाओं को श्रीराम से सीखनी चाहिए ये 5 बातें, जीवन जीने का बदल जाएगा नजरिया

Published: Mon, 19 Oct 2026 12:19 PM (IST)

सभ्य का तात्पर्य सार्वजनिक हित के साथ तादात्म्य की योग्यता रखने वाला युवा। व्यक्तिमत्ता की कोई दुर्बलता अथवा सबलता जिसे ...और पढ़ें

सभ्य युवा और श्रीराम: राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक गुण

सभ्य युवा और श्रीराम: राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक गुण

HighLights

  1. श्रीराम ने बड़ों का सम्मान और प्रजा का कुशल-मंगल पूछा

  2. निंदनीय बातों में रुचि नहीं, इंद्रियों पर था नियंत्रण

  3. विपत्ति में धैर्य, सामूहिक हित को प्राथमिकता दी

आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण, सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या। एक वैदिक प्रार्थना में अपने राष्ट्र के सर्वांग सुंदर व समर्थ होने की आकांक्षा व्यक्त की गई है। इस वैदिक सूक्त में विद्वान ब्राह्मण, कुशल योद्धा, सुयोग्य स्त्रियां, भारवाही बैल, दुधारू गाय, द्रुतगामी अश्व एवं यथाकाल बरसने वालों मेघों के साथ ‘सभ्य युवा’ को सम्मिलित किया गया है- “आ ब्रह्मन्ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वान्आशुः सप्तिः पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्॥” हम यहां सभ्य युवा पर विचार कर रहे हैं। वेद के अनुसार, योग-क्षेम में समर्थ राष्ट्र के लिए सभ्य युवा उसकी आवश्यकता है।

संस्कारशील युवा किसी राष्ट्र के अभिभावकत्व का, उसकी परंपरा के अक्षुण्ण प्रवाह का प्रमाण हैं। सभेय अर्थात सभा के योग्य, अर्थात प्रौढ़ समाज के साथ संवादशील युवा राष्ट्र की भावयित्री तथा कारयित्री क्षमता का प्रतिनिधित्व करता हुआ, उसे वंश-परंपरा में आगे ले जाता है। युवा के महत्व को रेखांकित करते यजुर्वेद के इस मंत्र के अर्थ का विस्तार हमें वेदावतार श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में दृष्टिगत होता है। श्रीदशरथजी ने जब अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को युवराज बनाने की इच्छा व्यक्त करते हुए मंत्रिमंडल का अभिमत जानना चाहा तो उनकी राजसभा ने बड़े उत्साह से श्रीराम के लिए अनुमोदन किया। इस पर महाराज दशरथ ने इसका कारण पूछा तो उन सबने उत्तर दिया कि हे राजन! श्रीराम के गुणों ने हम सबको आकृष्ट कर लिया है। इस प्रसंग में एक युवा के रूप में श्रीराम के गुणों का उल्लेख है। अनेक विशेषताओं में सहज सुलभ और सर्वत्र वांछनीय, मानवीय चरित्र को निखारने वाले कुछ ऐसे गुणों की चर्चा हम यहां कर रहे हैं, जो आगे श्रीरामराज्य में राजा से प्रजा तक विकसित हुए गुण हैं।

दशरथ जी के मंत्रियों ने कहा कि श्रीराम अनुभवी वृद्धों के उपासक हैं अर्थात उनकी सेवा करने वाले और उनकी बात सुनने वाले हैं- ‘बहुश्रुतानां वृद्धानां ब्राह्मणानामुपासिता।’ जैसे पिता अपने पुत्रों का कुशल-मंगल पूछता है, उसी प्रकार वे समस्त पुरवासियों से उनका समाचार पूछा करते हैं- ‘निखिलेनानुपूर्व्या च पिता पुत्रानिवौरसान्।’ यहां श्रीराम के विषय में एक अत्यंत उल्लेखनीय वाक्य आता है- न विगृह्यकथारुचिः अर्थात निंदनीय बातों की चर्चा में उनकी रुचि नहीं होती। उनकी इंद्रियां विषयों में लिप्त नहीं हैं। तरुणी अथवा वृद्धा सभी स्त्रियां श्रीराम की सराहना करती हैं।

अंत:करण के बल से युक्त, स्वस्थ मन और शरीर वाले युवा के लिए विपत्ति रुदन का कारण नहीं  बनती, वह तो वस्तुतः उसके असाधारण बल-बुद्धि की परीक्षा द्वारा उसके नायकत्व की प्रतिष्ठा ही करती है। रावण-वध करके श्रीभरत की स्मृति से विह्वल श्रीराम जब अयोध्या लौटते हैं तो 14 वर्षों के असहनीय तप से उनकी कांति और बढ़ गई है। उनका सौजन्य-शील-सद्भाव किंचित भी न्यून नहीं हुआ है। गोस्वामी जी कहते हैं कि प्रभु श्रीराम ने पहले तीनों भाइयों का स्नानादि संस्कार कराया, उन्हें सुसज्जित कर पुनः स्वयं प्रस्तुत हुए। श्रीराम का यह औदार्य आगे दृष्टिगत होता है, जब वे राज्यारूढ़ होकर प्रजा को संबोधित करते हैं। श्रीरामचरितमानस के अनुसार प्रभु ने कहा- ‘कोई प्रभुता अनीति में चरितार्थ नहीं होती। राजा की भांति प्रजा भी स्वधर्म पालन करने में स्वतंत्र है। दुर्लभ मनुष्य जीवन को धन्य करने का जो मार्ग है, सबको उसका आश्रय करना चाहिए। यदि मैं कुछ अनुचित करूं अथवा कहूं तो भय का त्याग कर मुझे उससे रोकें।’

लक्ष्मणजी के मना कर देने पर श्रीभरत को युवराज बनाकर श्रीराम ने अपने राज्यकाल में चरित्र का जो प्रमाण उपस्थित किया, वह मनुष्य-मात्र का आदर्श बना। विशेष रूप से युवावर्ग, जिसके लिए श्रीराम का आत्मानुशासित और आज्ञानुवर्ती जीवन एक एक शिक्षापाठ की भांति उपस्थित हुआ। सिंहासनोन्मुख समाज को रामराज्य से श्रीराम ने चरित्रोन्मुख होने का संस्कार दिया। संवाद, सौमनस्य और समेकित शुभता की साधना युवावर्ग को विशेष रूप से करनी होती है। बाल्यकाल में सहज एकत्रीकरण हो जाता है, वृद्धजन भी परस्पर संवादशील होते हैं। युवा को इसकी विशेष चेष्टा करनी होती है। अधिक ऊर्जा, बड़े लक्ष्य तथा स्वयं को सिद्ध करने की उत्कंठा उसे एकाकी करती जाती है। इस समय अपनी सिद्धि को व्यक्तिमूलक मानने के स्थान पर विचारमूलक मानने से सहभाव बढ़ता है, श्रीराम का जीवन इसका प्रशस्त उदाहरण है।

वे कहीं स्वयं को केंद्र में नहीं रखते, सदैव एक सत्य और उसके प्रति पितृ-परंपरा से प्राप्त निष्ठा उनके लिए प्रमाण बनती है, अतः वे कभी स्वयं प्रवृत्त होने अथवा अन्य को प्रेरित करते हुए व्यक्तिनिष्ठ नहीं होते। श्रीराम एक ऐसे युवा का चरित्र हमारे लिए स्पष्ट करते हैं, जो अपनी प्राप्तियों के लिए आतुर नहीं है, बल्कि जिनको अपेक्षा है अथवा जो वंचित हैं, उनको लाभान्वित करने का व्रत ही उस युवा का महत्तर लक्ष्य है। आदान नहीं, अपितु प्रदान को प्रस्तुत, अधिक समृद्ध-सशक्त युवा रामराज्य की अवधारणा में दृष्टिगत होता है। उमड़ती हुई क्षमता को रचनात्मकता में ढलने के लिए सही सांचे की आवश्यकता होती है, वह सांचा परंपरा से, वृद्धों से, जीवन का अनुभव रखने वालों की साझा अनुभूतियों से बनता है। श्रीराम को लोकाभिराम कहा जाता है, क्योंकि उनका बल-विवेक लोक की आकांक्षा को तृप्त करता है, उनका पुरुषार्थ सभी के अर्थ की सिद्धि करता है।

अपना आपा संभालने में यत्नशील, अपनी आग को पचा रखने में समर्थ, इच्छाओं के वेग से अनुद्विग्न और सभ्य युवा। सभ्य का तात्पर्य, सार्वजनिक हित के साथ तादात्म्य की योग्यता रखना वाला युवा। व्यक्तिमत्ता की कोई दुर्बलता अथवा सबलता जिसे अनिष्टकर नहीं बना सकती, ऐसा युवा रामराज्य की भावभूमि पर उभरता है।