जल में कमल की तरह रहें: दत्तात्रेय भगवान ने कबूतर की कहानी से बताया कैसे मोह-माया बनती है मृत्यु का बड़ा जाल
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दत्तात्रेय ने कबूतर की कहानी से दिया जीवन का बड़ा सबक
HighLights
भगवान दत्तात्रेय ने कबूतर को गुरु मानकर आसक्ति का पाठ सिखाया
अत्यधिक मोह-माया जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसाती है
संसार में रहते हुए भी कमल की तरह निर्लिप्त रहना चाहिए
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम मायाकुंड, ऋषिकेश)। भगवान दत्तात्रेय ने कपोत अर्थात कबूतर को गुरु मानकर उससे यह सीखा कि आसक्ति ही यमदंड है। यह जीव आसक्ति और मोह के बंधन पड़कर, स्वयं ही स्वयं का सर्वनाश कर बैठता है। स्नेह और मोह के बीच की सूक्ष्म रेखा को पहचानना आवश्यक है। अत्यधिक स्नेह ही बंधन कारण बनता है और यही जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र में घुमाता रहता है। एक आध्यात्मिक साधक को चाहिए कि वह अपने चित्त को केवल परमात्मा में लगाए, क्योंकि संसार की हर वस्तु और संबंध नश्वर हैं।
भगवान दत्तात्रेय महाभाग राजा यदु को उपदेशित करते हैं- हे राजन! इस पृथ्वी पर विचरण करते हुए मैंने देखा कि वन में एक कबूतर एक वृक्ष पर घोंसला बनाकर अपनी पत्नी कबूतरी के साथ वहां वर्षों से निवास करता था।
कपोतः कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।
कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित् समाः।।
वे दोनों एक-दूसरे के प्रति अत्यधिक प्रेम और स्नेह से बंधे हुए थे। वे अपनी दृष्टि से दृष्टि को, अंगों से अंगों को और अपनी बुद्धि (विचारों) से एक-दूसरे की बुद्धि को बांधे रखते थे। दोनों साथ-साथ सोते, साथ बैठते, साथ घूमते, साथ बातें करते और साथ ही भोजन करते थे। वे जोड़े के रूप में निर्भय होकर वन की लताओं और कुंजों में विहार करते थे।
यं यं वांछति सा राजंस्तर्पयंत्यनुकंपिता ।
तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेंद्रियः।।
हे राजन! उसकी भार्या कबूतरी जिस-जिस वस्तु की इच्छा करती थी, वह कठिन परिश्रम से उसे पूरा करता था। समय बीतने के साथ, उस युगल के घोंसले में अंडों से छोटे-छोटे बच्चे निकले। उन बच्चों की चंचलता ने उन दोनों के हृदय को बांध लिया। अब उनका सारा समय उन बच्चों के पालन-पोषण में बीतने लगा। एक दिन, जब कबूतर और कबूतरी भोजन की तलाश में बाहर गए हुए थे, तभी वहां एक बहेलिया आया। उसने पेड़ पर बने घोंसले के नीचे जाल फैला दिया और उसमें लुभावने दाने डाल दिए।
कबूतर के बच्चे लोभवश उन्हें चुगने आ गए और जाल में फंस गए। उसी समय कबूतरी भोजन लेकर वापस लौटी तथा अपने बच्चों को जाल में फड़फड़ाते हुए देखा। ममता-मोह के वशीभूत होकर वह बच्चों को बचाने की व्याकुलता में जाल में कूद पड़ी और फंस गई। उसी समय कबूतर भी आ गया। यह सब देखकर वह शोक में डूब गया। उसका भी विवेक नष्ट हो गया। हे राजन!
यद्यपि वह कबूतर स्वतंत्र था और उड़कर अपनी जान बचा सकता था, किंतु मोह की बेड़ियों ने उसकी बुद्धि को जड़ कर दिया था। वह विलाप करता हुआ स्वयं भी उसी जाल में जा गिरा। काल रूपी शिकारी क्रूर हंसी के साथ से मोहासक्त पूरे कपोत परिवार को मृत्युजाल में समेटकर चल गया। यहां दार्शनिक तथ्य यह है कि स्नेह पोषण है, लेकिन मोह अंधा कर देता है। कबूतर दंपत्ति का अपने परिवार से प्रेम अच्छा था, लेकिन उस प्रेम में विवेक खो देना आत्मघाती साबित हुआ।
यस्त्वप्राप्यैहिकं भोगं काम्यानां च विनिश्चयम्।
आसक्तः स विहंग इव बध्यते मृत्युपाशकैः॥
दत्तात्रेय जी कहते हैं, हे राजन! जिस प्रकार वह कबूतर अपनी स्वतंत्रता को भूलकर परिवार के मोह में स्वयं मृत्यु के मुख में चला गया, ठीक उसी प्रकार मोहासक्त प्राणी अपने मुक्ति के मार्ग को त्यागकर, सांसारिक सुखों, स्त्री, पुत्र और धनादि में आसक्त हो जाता है। अत्यधिक आसक्ति ही यमदंड है। यहां जीवन प्रबंधन का सूत्र यह है कि व्यक्ति अपने दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए, किंतु मानसिक रूप से इतना सजग होना चाहिए कि किसी भी बाहरी हानि से आंतरिक संतुलन न बिगड़ने पाए।
हे राजन! मैंने इस दृष्टांत से यह शिक्षा ग्रहण की कि परिवार का पालन करना कर्तव्य है, किंतु उनमें इस प्रकार रच-बस जाना कि स्वयं का आत्म-कल्याण ही विस्मृत हो जाए, सर्वनाश का कारण बनता है। इंद्रियों के वश में रहने वाला व्यक्ति सत्य को नहीं देख पाता। जो मनुष्य दुर्लभ मानव देह पाकर भी केवल गृहस्थी के प्रपंच और मोहमाया में ही फंसा रहता है, वह कबूतर की भांति ही है। एक आध्यात्मिक साधक की बुद्धिमानी इसी में है कि वह संसार में रहते हुए भी जल में कमल की भांति निर्लिप्त रहे।
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