छठ में डूबते सूर्य को भी क्यों दिया जाता है अर्घ्य? जानें इस परंपरा का खास महत्व
प्राकृतिक प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव के बिना जीवन संभव नहीं है। उनकी पूजा का पर्व है छठ। अस्ताचलगामी सूर्य को भी ...और पढ़ें
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छठ महापर्व: डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का गहरा अर्थ और परंपरा
प्रो. मुरलीमनोहर पाठक, कुलपति, श्रीलालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय। भारतीय संस्कृति ने संपूर्ण सृष्टि को एकात्म भाव से देखते हुए प्रकृति के प्रत्येक उपादान में दिव्यता का साक्षात्कार किया है। इसी उदात्त सांस्कृतिक परंपरा में सूर्योपासना का विशिष्ट स्थान है। सूर्य को प्रत्यक्ष देवता, जगत की आत्मा, जीवन एवं ऊर्जा का मूल स्रोत स्वीकार किया गया है। इसी सूर्योपासना की अत्यंत प्राचीन, लोकमंगलकारी एवं आध्यात्मिक परंपरा का अनुपम स्वरूप है, सूर्य षष्ठी अथवा छठ महापर्व।
यह पर्व भारतीय लोकजीवन में आस्था, आत्मानुशासन, पवित्रता, संयम, कृतज्ञता और सामाजिक समरसता का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। इसकी विशिष्टता यह है कि इसमें अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ-साथ अगले दिन उदीयमान सूर्य की भी उपासना की जाती है। इस प्रकार जीवन के अस्त और उदय, दोनों अवस्थाओं के प्रति समान श्रद्धा व्यक्त की जाती है। भविष्यपुराण के अनुसार कार्त्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को मुख्य व्रत किया जाता है-
शुक्ले कार्त्तिकमासे च षष्ठ्यां सम्पूज्य भास्करम् ।
उपोष्य सप्तमीं चैव मुच्यते सर्वकिल्विषैः।।
ऋग्वेद में सूर्य, सविता, मित्रा, पूषा एवं आदित्य आदि देवस्वरूपों के माध्यम से सूर्य की महिमा का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध सूर्यसूक्त तथा गायत्राी मंत्र सूर्य के सवितृस्वरूप की उपासना के महत्व को अभिव्यक्त करते हैं।
प्राचीन भारतीय समाज कृषि एवं प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर था। सूर्य की किरणें कृषि उत्पादन, ऋतुचक्र, वनस्पति, जलचक्र तथा जीव-जगत के अस्तित्व के लिए अनिवार्य थीं। अतः सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा भारतीय समाज में स्वाभाविक रूप से विकसित हुई। छठ पर्व में नई फसल, ऋतुजन्य फल, गन्ना, चावल, गेहूं तथा अन्य कृषि उत्पादों का प्रयोग इसी कृषि-सांस्कृतिक चेतना का परिचायक है। इस पर्व की एक विशेषता यह भी है कि इसमें किसी कर्मकांड अथवा पुरोहित की आवश्यकता नहीं पड़ती। व्रती और आराध्य सूर्य के मध्य सीधा संबंध स्थापित होता है।
सूर्यदेव ऐसे प्रत्यक्ष देवता हैं जिनका दर्शन प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन कर सकता है। वे समस्त जीवों को प्रकाश, ऊष्मा एवं ऊर्जा प्रदान करते हैं। इस पर्व के माध्यम से मनुष्य उस प्रकृति-शक्ति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है, जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है।
अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने में छठ का संदेश है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था वंदनीय है। अस्त होता हुआ सूर्य भी उतना ही पूजनीय है जितना उदित होता हुआ सूर्य। यह भाव भारतीय संस्कृति की समता, कृतज्ञता एवं उदारता का अनुपम उदाहरण है।
इस पर्व की एक विशेषता यह है कि इसमें घर से लेकर घाट तक प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में सहयोग करता है। कोई घाट की सफाई करता है, कोई पूजन सामग्री की व्यवस्था करता है, कोई प्रसाद तैयार करता है और कोई व्रती की सेवा में संलग्न रहता है। इस प्रकार छठ व्यक्तिगत साधना के साथ सामुदायिक सहभागिता का भी महापर्व है। इस अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीतों में मां की ममता, संतान के प्रति वात्सल्य, परिवार की सुख-समृद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता तथा सूर्यदेव की महिमा का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण मिलता है।
इस व्रत को प्रतिहार षष्ठी या डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। वस्तुतः यह सूर्य की उपासना है, किंतु षष्ठी तिथि में होने के कारण माताओं ने इसे छठी मैया अथवा छठ मैया की पूजा के रूप में जीवन में अपनाया है। इस रूप में जगत के नियामक देव और देवी की पूजा हो जाती है ।
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