[शशिशेखर त्रिपाठी]

हनुमान जब अशोक वाटिका उजाड़ने और रावण के एक पुत्र का वध करने के बाद रावण के सामने ले जाए गये तब रावण को धर्म के मार्ग में चलने का ज्ञान दिया लेकिन रावण अपने आराध्य शिव के अवतार को पहचान ही नहीं सका। हनुमान जी गुरु के रूप में उसको सही मार्ग दिखाने का प्रयास कर रहे थे और रावण अपने अहंकार में चूर उन्हीं की पूछ में लगाने का आदेश देता है।

 

भौतिकवादी युग में गुरु के प्रति आस्था खत्म होती जा रही है और सच्चा गुरु भी मिलना सरल नहीं रह गया है। नतीजन जीवन में अशांति, असुरक्षा और मानवीय गुणों का अभाव पैदा हो रहा है।

 

तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की चौपाई का प्रारम्भ करते हुए स्पष्ट किया है कि ज्ञान और गुण के सागर हैं हनुमान। अगर चाहते तो वह ज्ञान और बल के सागर भी लिख सकते थे लेकिन तुलसीबाबा ने ज्ञान और गुणों के सागर लिखा। अंग्रेजी में समझें कि नॉलेज और क्वालिटी साथ में क्वांटिटी (सागर) है। हनुमान जी में ज्ञान और गुणों की अपार मात्रा है इसलिए उनकी ख्याति तीनों लोको में है। यहां हम लोगों के समझना है कि हमारे भीतर ज्ञान और गुणों को भरने वाला गुरु, शिक्षक है।

 

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर

 

एक विशेष बात यह है कि तुलसीदासजी ने रामचरित मानस और हनुमान चालीसा के प्रारंभ में ही गुरु वंदना की है। उन्होंने कहा है कि अगर किसी का गुरु नहीं है तो वह हनुमान जी को अपना गुरु बना सकता है। ईश्वर का साक्षात्कार बिना गुरुकृपा के होना कठिन है। हनुमान जी के सामने पवित्र भाव रखते हुए उन्हें अपना गुरु बनाया जा सकता है। एकमात्र हनुमान जी ही है जिनकी कृपा हम गुरु की तरह प्राप्त कर सकते हैं। तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा का शुभारंभ ही गुरु के चरणों में नमन करते हुए किया है-

 

श्री गुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारि

बरनऊं रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि

बुद्धि हीन तनु जानके, सुमिरौ पवन कुमार

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार

 

तुलसीबाबा ने हनुमान चालीसा में सभी को बजरंगबली को अपना गुरु बनाने को कहा है।

 

जय जय जय हनुमान गोसाईं

कृपा करहु गुरु देव की नाई.......

 

उन्होंने शिष्य को सचेत करते हुए कहा है कि हनुमान जी को गुरु को बनाने के बाद अनुशासनहीनता नहीं करनी चाहिए। अपनी मति और गति सही दिशा की ओर रखनी चाहिए। राम भक्त की कृपा पानी हो तो उन्हें नियम, भक्ति और समर्पण से ही प्रसन्न किया जा सकता है। हनुमान जी उन्हीं पर कृपा करते हैं जिनके विचार नेक होते हैं।

 

कुमति निवार सुमति के संगी....

रामचरितमानस के आरंभ में सर्वप्रथम गुरु वंदना को ही प्रधानता दी गई है।

 

श्री गुरु पद नख मनिगन जोति।

सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।।

 

अर्थात् श्री गुरु चरण के स्मरण मात्र से ही आत्मज्योति का विकास हो जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु पद को सर्वोपरि माना गया है। जीव को ईश्वर की अनुभूति और साक्षात्कार कराने वाली मान प्रतिमा गुरु ही हैं। इस कारण गुरु को साक्षात् ब्रह्मा तुल्य स्वीकार किया है।

 

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः

गुरुःसाक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

 

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि हमारी प्रचीन गुरुकुल परम्परा। गुरुकुल संस्कृति ने महर्षि, तपस्वी, राष्ट्रभक्त, चक्रवर्ती सम्राट और जगद्गुरु तक के सुयोग्य महापुरुष उपलब्ध कराएं हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने भी गुरु महिमा को सर्वोपरि माना है। जनकपुरी में ऋषि विश्वामित्र की सेवा इसका प्रमाण है।

 

तेइ दोऊ बंधु प्रेम जनु जीते।

गुरु पद कमल पलोटत प्रीते।।

 

समस्त धार्मिक संप्रदाय गुरु पद की महिमा को स्वीकार करते हैं। गुरु के निर्देशन की अवज्ञा करने के लिए जीवन में सुख और सफलता प्राप्त करना असंभव माना गया है।

 

गुरु के वचन प्रतीती न जेही।

सपनेउ सुलभ न सुख सिधि तेही।।               

 

भारतीय संस्कृति में गुरु आश्रय रहित व्यक्ति को अत्यंत हेय माना गया है। वर्तमान समय में भौतिकवादी जन समुदाय में गुरु के प्रति आस्था का प्रायः अभाव सा होता जा रहा है। विशेषकर युवावर्ग इससे दूर है। जिसके परिणामस्वरुप जीवन में अशांति, असुरक्षा और मानवीय गुणों का अभाव हो रहा है। हमारे देश के ऋषि-महर्षि, तीर्थकर और संतमहापुरुष गौतम बुद्ध, महावीर जैसी दिव्य विभूतियों ने गुरु पद से अपने उपदेशों से उदार भावना स्थापित की।

 

गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई।

जो विरंचि शंकर सम होई।।

 

साधक को जीवन की सार्थकता के लिए योग्य गुरु की कृपा प्राप्त करना अतिआवश्यक होता है। गुरु प्राप्ति के लिए एकलव्य के समान अपार श्रद्धा और विश्वास की आवश्यकता है। गुरु पूर्णिमा को अपने गुरु का पूजन, वंदन और सम्मान किया जाता है।

 

 

Posted By: abhishek.tiwari