नई दिल्ली, ललित गर्ग। सदा अनुकूल परिस्थिति का निर्माण हो, ऐसा विश्व में कभी नहीं होता। प्रतिकूल परिस्थितियां भी आ ही जाती हैं। शांति वहीं होती है, जहां अनुकूल और प्रतिकूल, दोनों प्रकार की स्थितियों के बीच भी मनुष्य का मन क्षुब्ध नहीं होता, चिंताग्रस्त एवं तनाव में नहीं होता। चिंता से भागकर कभी नहीं बच सकते, परंतु यदि उसके प्रति स्वयं की मानसिकता को बदला जाए तो चिंता को दूर भगाया जा सकता है, लेकिन हर व्यक्ति में इतनी सामथ्र्य नहीं है। जब तक व्यक्ति में संयम, समता और संतुलन का विकास करने की क्षमता विकसित नहीं होती, तब तक व्यक्ति दुखद क्षणों को सुख में बदलने की कला से सुसज्जित नहीं हो सकता।

एक ही परिस्थिति और घटना को दो व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से ग्रहण करते हैं, लेकिन जिनका चिंतन सकारात्मक होता है, वे दुख को सुख, अभाव को भाव, अशांति को शांति और अंधेरों को प्रकाश में बदलने में सफल हो सकते हैं। जो इस तरह की कला जानते हैं, उन्हीं का जीना सार्थक है। हर व्यक्ति के मस्तिष्क में दो हिस्से होते हैं-एक बाहर की दुनिया के लिए और दूसरा भीतर की दुनिया के लिए। इसमें जो बाहर की दुनिया के लिए प्रयुक्त होने वाला बायां भाग है, उसे तो बहुत सक्रिय कर दिया गया, लेकिन दूसरा वाला दायां भाग पूरी तरह से निष्क्रिय रखा गया। यह भाग पूरी तरह से सुप्त पड़ा है। इसीलिए सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। अगर हम बाहर और भीतर के जगत का समन्वय स्थापित कर सके तो हमारा जीवन भी संतुलित रहेगा।

जीवन में शांति परिस्थितियों को ठीक करने से नहीं मिलती, बल्कि यह जान लेने से मिलती है कि आप भीतर से क्या हैं? सुख से प्यार और दुख से घृणा की मनोवृत्ति ने ही इंसान को विरोधाभासी जीवन दिया है। जब मन में शांति के फूल खिलते हैं, तो कांटों में भी फूलों का दर्शन होता है। जब मन में अशांति के कांटे होते हैं, तो फूलों में भी चुभन और पीड़ा का अनुभव होता है।

Edited By: Ruhee Parvez

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