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गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार के नियम: दामाद क्यों नहीं देता सास-ससुर की अर्थी को कंधा?

Published: Wed, 08 Jul 2026 04:08 PM (IST)

सनातन धर्म में दामाद का स्थान बेहद आदरणीय माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दामाद से किसी भी प्रकार का ...और पढ़ें

गरुण पुराण में बताए गए हैं अंतिम संस्‍कार के कुछ नियम। (Picture Credit- AI Generated)

गरुण पुराण में बताए गए हैं अंतिम संस्‍कार के कुछ नियम। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में 18 महापुराणों का जिक्र मिलता है, जिनमें से गरुड़ पुराण का भी बहुत महत्व बताया गया है। इस पुराण में खासतौर पर व्यक्ति की मृत्यु के बाद की स्थिति और यमलोक के बारे में बताया गया है। इसमें कई प्रथाओं का भी जिक्र मिलता है, जिनमें से एक है कि दामाद को कभी भी अपने सास-ससुर की अर्थी को कंधा नहीं देना चाहिए।

हालांकि, वक्‍त के साथ लोगों की सोच में बदलाव आया है और पुराणों में लिखी कई सारी प्रथाओं को आज की पीढ़ी के लोग मानते भी नहीं हैं, मगर गरुड़ पुराण में लिखी इस प्रथा का क्‍या महत्‍व है चलिए जानते हैं।

गरुड़ पुराण के किस खंड में लिखी यह बात

गरुड़ पुराण के 'प्रेत खंड' में इस बात का जिक्र किया गया है कि दामाद को जमाई कहा जाता है और जम का मतलब यम होता है। हिंदू धर्म दामाद को बहुत सम्‍मान दिया जाता है, उसके पीछे का भी कारण गरुड़ पुराण में यही बताया गया है। दरअसल, दामाद को यम की तरह शक्तिशाली बताया गया है। इसलिए पुराण के प्रेत खंड और आचार कांड में इस बात का साफ-साफ जिक्र मिलता है कि, जो सास-ससुर अपने जमाई से धन लेते हैं, उसके घर का पानी पीते हैं या फिर उसके साथ सही व्‍यवहार नहीं करते हैं, मृत्‍यु के बाद उनकी यमलोक के लिए यात्रा बहुत कठिन रहती है।

यह भी धारणा है कि किसी का अंतिम संस्‍कार केवल उस कुल या परिवार के सदस्‍य ही कर सकते हैं। हिंदू धर्म में बेटी और दामाद को अतिथि माना गया है।इस वजह से भी दामाद को सास-ससुर की अर्थी को कंधा देना वर्जित माना गया है।

जिसका पुत्र उसका अंतिम संस्‍कार कौन करे?

गरुड़ पुराण के प्रेत खंड में ही यह भी बताया गया है कि बेटियां पराए घर का धन होती हैं। माता-पिता की अंतिम यात्रा का कोई भी काम बेटी या दामाद नहीं कर सकते हैं। ऐसे में जिनका पुत्र या पौत्र न हो, तो उनका दाह संस्कार बेटी का पुत्र कर सकता है। यही नहीं नाती अपनी नानी का श्राद्धकर्म भी कर सकता है।

हालांकि, आधुनिक समय की पीढ़ी इन बातों पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देती है। कई बार व्‍यवस्‍थाएं भी ऐसी होती हैं, कि इन प्रथाओं का मानना मुश्किल हो जाता है। अतः सही नीयत से किया गया कोई भी कर्म बुरा नहीं हो सकता है। आज की स्थितियों और परिस्थितियों के हिसाब से कई बार हमें खुद को बदलना पड़ता है और हम प्रथाओं का अनुसरण नहीं कर पाते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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