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शिव की जटाओं में क्यों समाईं गंगा? रामायण और शिव पुराण के अनुसार पढ़ें ये अद्भुत कथा

Published: Fri, 13 Feb 2026 06:45 PM (IST)Updated: Fri, 13 Feb 2026 06:49 PM (IST)

भगवान शिव ने मां गंगा को अपनी जटाओं में क्यों बांधा? पढ़ें राजा भागीरथ की कठिन तपस्या, गंगा का अहंकार ...और पढ़ें

शिव की जटाओं में क्यों कैद हुईं मां गंगा? (Image Source: Freepik)

शिव की जटाओं में क्यों कैद हुईं मां गंगा? (Image Source: Freepik)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि मां का दर्जा दिया गया है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि स्वर्ग में बहने वाली अलकनंदा (गंगा) महादेव की जटाओं में कैसे समा गईं? इसके पीछे त्याग, तपस्या और ब्रह्मांड को बचाने की एक रोमांचक कहानी छिपी है।

भागीरथ की कठोर तपस्या

कथा की शुरुआत होती है इक्ष्वाकु वंश के राजा भागीरथ से। उनके पूर्वजों (सगर के 60,000 पुत्रों) को कपिल मुनि के श्राप के कारण मुक्ति नहीं मिल पा रही थी। उनकी आत्मा की शांति के लिए केवल मां गंगा का जल ही एकमात्र उपाय था। वाल्मीकि रामायण के बाल कांड के अनुसार, भागीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की।

जब शिव ने तोड़ा गंगा का अहंकार

भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा धरती पर आने को तैयार तो हो गईं लेकिन, एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि अगर वह सीधे स्वर्ग से धरती पर गिरतीं, तो पृथ्वी उनकी गति को सह नहीं पाती और रसातल में समा जाती। शिव पुराण के अनुसार, गंगा को अपने वेग पर थोड़ा अभिमान भी था, उन्हें लगा कि उनके प्रवाह में महादेव भी बह जाएंगे।

Mahadev katha

(Image Source: AI-Generated)

जब भागीरथ ने यह संकट देखा, तो उन्होंने भगवान शिव की शरण ली। शिव जी जानते थे कि गंगा के वेग को नियंत्रित करना जरूरी है। जैसे ही गंगा पूरे अहंकार के साथ स्वर्ग से नीचे गिरीं, शिव जी ने अपनी विशाल जटाएं फैला दीं।

जटाओं में कैद हुईं गंगा

गंगा जैसे ही शिव के शीश पर गिरीं, वे उनकी घनी जटाओं के जाल में पूरी तरह उलझकर रह गईं। शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं में इस तरह कैद कर लिया कि वे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं ढूंढ पायीं। कई वर्षों तक गंगा शिव की जटाओं में ही भटकती रहीं। शिव पुराण के अनुसार, यह महादेव की एक लीला थी ताकि गंगा का अहंकार चूर हो सके और धरती प्रलय से बच जाए।

विष्णु पुराण के अनुसार, भागीरथ की फिर से प्रार्थना करने पर, शिव जी ने अपनी जटाओं की एक लट खोली और गंगा की एक पतली धारा धरती पर प्रवाहित हुई, जिसे हम 'भागीरथी' के नाम से जानते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।