सावधान! श्राद्ध करते समय न करें समय की भूल, आखिर क्यों 'अभिजीत मुहूर्त' में किया गया तर्पण माना जाता है श्रेष्ठ?
पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्मों का विशेष महत्व है, जिसमें कुतुप काल को ...और पढ़ें

पितृ पक्ष श्राद्ध: कुतुप काल और अभिजीत मुहूर्त का विशेष महत्व (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
कुतुप काल पितृ पक्ष श्राद्ध के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
श्राद्ध कर्मों के लिए सही तिथि और उचित समय महत्वपूर्ण हैं।
स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखकर ही श्राद्ध करें।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पितृ पक्ष के सोलह दिनों में पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद बना रहता है।
श्राद्ध और तर्पण को सिर्फ एक शुभ कर्म नहीं माना माता जाए है, बल्कि पूर्वजों की प्रसन्न करने का एक माध्यम भी बताया जाता है। गरुड़ पुराण में श्राद्ध के कई नियम बनाए गए हैं जिनमें से एक है सही समय और शुभ मुहूर्त में जल तर्पण करना और श्राद्ध करना।
दिन का एक सबसे शुभ समय पूर्वजों को समर्पित होता है और इसी अवधि में किया गया श्राद्ध पूर्वजों को स्वीकार होता है। आइए आपको बताते हैं किस समय श्राद्ध करना शुभ होता है।
श्राद्ध के लिए सबसे शुभ है अभिजीत मुहूर्त या कुतुप काल
आमतौर पर कोई भी पूजा-पाठ ब्रह्म मुहूर्त में करना शुभ होता है, लेकिन पूर्वजों के निमित्ति किया गया श्राद्ध हमेशा अभिजीत मुहूर्त जिसे कुतुप काल भी कहा जाता है, उसी में करना शुभ माना जाता है।
गरुड़ पुराण और धर्म शास्त्रों में इस विशेष समय को पूर्वजों के लिए शुभ माना जाता है। इसी वजह से पितृ पूजा से लेकर तर्पण तक सभी कार्य इसी शुभ मुहूर्त में करने के लिए कहा जाता है।
क्या होता है अभिजीत मुहूर्त या कुतुप काल?
अभिजीत मुहूर्त दिन के आठवें मुहूर्त को कहा जाता है और इसे कुतुप काल के नाम से भी जाना जाता है। कुतुप काल दोपहर के समय आने वाला एक विशेष मुहूर्त होता है।
इसकी अवधि स्थान और सूर्योदय के समय के आधार पर बदलती रहती है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजे से लगभग 24 मिनट पहले शुरू होता है और यह 12 बजे के 24 मिनट बाद तक रहता है, यानी कि यह प्रातः 11:48 से आरंभ होकर दोपहल 12:20 तक चलता है।
इस दौरान ही श्राद्ध या उससे जुड़े कर्म करने की सलाह दी जाती है। यही वो समय होता है जब पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और वंशजों का अन्न और जल ग्रहण करते हैं। कुतुप काल की कुल अवधि 48 मिनट होती है।
श्राद्ध अभिजीत मुहूर्त में ही क्यों शुभ है?
पितृ पक्ष के श्राद्ध को परवण श्राद्ध की श्रेणी में रखा जाता है। परंपरागत रूप से इसके लिए कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और इसके बाद का अपराह्न काल महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
धार्मिक विधि में श्राद्ध कर्म पूरा करने के बाद ही तर्पण किया जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार दिनभर के 15 मुहूर्तों में से आठवां मुहूर्त कुतुप काल या अभिजीत मुहूर्त कहलाता है।
यह वह समय माना जाता है जब पितरों की आत्माएं अपने वंशजों के आस-पास ही किसी न किसी रूप में मौजूद होती हैं। पूर्वजों की आत्मा इस दौरान वंशजों से भोजन ग्रहण करती हैं। इस समय किए गए सभी कर्मकांड सीधे पितरों तक पहुंचते हैं। इसलिए इसी मुहूर्त में श्राद्ध करना शुभ होता है।
अगर आप भी पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं, तो समय का ध्यान रखना जरूरी होता है, जिससे यह पूर्ण रूप से स्वीकार्य हो।
यह भी पढ़ें- गरुड़ पुराण का रहस्य: पितृ पक्ष में रोज सुबह मुख्य द्वार पर करें यह 1 उपाय, पूर्वजों की नाराजगी होगी दूर
यह भी पढ़ें- पितृ पक्ष में काले तिल का दान क्यों होता है अनिवार्य? 1 भूल और पूर्वज रह जाएंगे भूखे!
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
