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करवाचौथ का चंद्रमा क्यों है सौभाग्य का प्रतीक: पढ़ें देवी पार्वती के तेज से लेकर दांपत्य के पोषण तक की अनूठी कथा

Published: Wed, 28 Oct 2026 03:00 PM (IST)

करवाचौथ व्रत में चंद्रमा का विशेष महत्व है, जहां महिलाएं निर्जला उपवास के बाद चांद की पूजा कर पति की ...और पढ़ें

करवाचौथ पर पढ़ें चांद का ज्योतिषीय महत्व? (Picture Credits- AI Images)

करवाचौथ पर पढ़ें चांद का ज्योतिषीय महत्व? (Picture Credits- AI Images)

HighLights

  1. करवाचौथ में चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व।

  2. ज्योतिष में चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतीक।

  3. चंद्रमा की उत्पत्ति से जुड़ी विभिन्न पौराणिक कथाएं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में करवाचौथ का व्रत बेहद मयाने रखता है। इस व्रत के दौरान चांद जिसे चंद्रा भी कहा जाता है, की पूजा और अर्घ्य दिया जाता है। पूरे दिन निर्जला उपवास के बाद महिलाएं पारंपरिक रूप से चांद को जल चढ़ाने के साथ प्रार्थना करती हैं।

करवाचौथ त्योहार में चंद्रमा की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। कई परिवारों में महिलाएं अपने पति को देखने और रस्म पूरी करने से पहले छलनी से चांद को देखती हैं।

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन, भावना, माता और मानसिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भावनात्मक स्वभाव और प्रतिक्रियाओं को जानने-समझने के लिए चंद्रमा राशि का इस्तेमाल किया जाता है।

कुंडली में चांद की स्थिति व्यक्ति की भावनाओं और रिश्ते पर उसके असर को दर्शाती है। करवाचौथ के मौके पर चांद का व्रत महत्व इसीलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह अपने प्यार, कमिटमेंट और पार्टनर की भलाई के लिए प्रार्थना करने का सबसे सुनहरा मौका होता है।

ज्योतिष परंपराओं में चंद्रमा को देखभाल, पोषण, संवेदनशील और भरण-पोषण से भी जुड़ा माना जाता है। ये गुण परिवार में खुशहाली और समृद्धि लाने के लिए जरूरी माने जाते हैं। करवाचौथ में चांद का अत्यधिक महत्व है क्योंकि यह व्रत चांद निकलने और उससे जुड़ी पूजा-पाठ और प्रसाद के बाद पूरा होता है।

करवाचौथ 2026 पर चांद कब निकलेगा?

29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को करवाचौथ का व्रत है। चांद निकलने का समय जगह के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है, इसलिए हर शहर के लिए एक ही समय प्रभावी नहीं होता है। अपने इलाके के चांद निकलने और पूजा के समय के लिए आप अपने लोकल पंचांग में चांद निकलने का समय देख सकते हैं।

चंद्रमा की उत्पत्ति से जुड़ी कथा

ऋग्वेद के दशम मंडल में वर्णन किया है कि- चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत, श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च हृदयात्सर्वमिदं जायते।

अर्थात्- उस विराट पुरुष के मन से चंद्रमा, आंखों से सूर्य, सुनने वाले अंग से वायु, हृदय से यह पूरा जगत उत्पन्न हुआ है। विष्णु पुराण की कथा के मुताबिक, जब कहीं कुछ नहीं था, तब उस विराट पुरुष (भगवान विष्णु को ही विराट पुरुष कहा जाता है) की इच्छा से दूध जैसा सफेद सागर बना। उस सागर में पीपल के पत्ते पर अजन्मा शिशु लेटा हुआ था। यह शिशु अपनी इच्छा से विकसित होता गया और पूर्ण पुरुष बन गया।

शिव पुराण में सूर्य और चंद्रमा की उत्पत्ति को लेकर कहा जाता है कि, शिव-पार्वती आनंद तांडव करते हुए एक होने लगे तो शिवजी के आंखों से निकली ऊर्जा सूर्य बन गई जबकि देवी पार्वती के कांतिमान देह से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई।चंद्रमा की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों में कई तरह की प्रचलित कहानियां देखने को मिलती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।