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घर के सदस्य क्यों नहीं खाते श्राद्ध का पहला खाना? जानिए 'पंचबलि' का वो नियम जो बदल देता है भोजन का महत्व

Published: Wed, 08 Jul 2026 01:30 PM (IST)

श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन कराना पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ...और पढ़ें

श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन कराने का महत्व और धार्मिक कारण (Picture Credit:AI Generated)

श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन कराने का महत्व और धार्मिक कारण (Picture Credit:AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म के अनुसार, कौओं को खाना कराना धार्मिक रीति-रिवाजों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। वैदिक संस्कृति में, कौवों को पवित्र माना गया है और रामायण काल में में भी उन्हें कागभुशुण्डि के रूप में भी पूजा जाता था।

यही नहीं सदियों से कौए को पूर्वजों का संदेशवाहक माना जाता है और इसी वजह से पितृ पक्ष में कौए को भोजन कराने की परंपरा है। यही नहीं गरुड़ पुराण में भी इस बात का वर्णन है कि कौए को भोजन कराने से यह भोजन सीधे पूर्वजों तक जाता है।

उन्हें बहुत पवित्र पक्षी के रूप में पूजा जाता है और भगवान शनि का वाहन माना जाता है, इसलिए कौए को न्याय, अनुशासन और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। आइए आपको बताते हैं श्राद्ध पक्ष में कौए को सबसे पहले भोजन कराने के कारणों के बारे में।

श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन कराने का महत्व

कौवों को खाना खिलाना पूर्वजों के प्रति सम्मान दिखाने, उन्हें याद करने और उनके प्रति आभार व्यक्त करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है। यही नहीं कई स्थानों में तो नियमित रूप से भोजन करते समय सबसे पहला कौर कौए के लिए निकाला जाता है जिसे 'बलि-वैश्वदेव' कहा जाता है।

यदि आप श्राद्ध पक्ष में कौए को भोजन कराएं और वह ग्रहण कर ले तो माना जाता है कि आपके पूर्वज प्रसन्न हैं और वो अपने वंशजों को आशीर्वाद दे रहे हैं। पितृ पक्ष में पूर्वजों के तर्पण और पिंडदान के साथ कौए को भोजन कराना भी कर्मकांड का एक हिस्सा माना जाता है।

कौओं और पूर्वजों के बीच क्या है संबंध

हिंदू मान्यताओं में कौओं का गहरा संबंध पूर्वजों की आत्माओं से माना जाता है। श्राद्ध और पितृ पक्ष में पूर्वजों के नाम का भोजन पक्षियों को खिलाना जरूरी परंपरा का हिस्सा है। मुख्य रूप से यह भोजन कौए, गाय और चींटी के लिए होता है। इनमें से सबसे पहले कौए को भोजन इसलिए कराने की सलाह दी जाती है क्योंकि इससे पूर्वजों का आशीर्वाद सीधे रूप में मिलता है और उन्हें वंशजों का भोजन स्वीकार्य भी हो जाता है।

इस अवधि में कौए को भोजन कराने के लिए शुद्धि का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी वजह से परिवार के सदस्यों के खाने से पहले शुद्ध और ताजा सात्विक भोजन ही कौए को अर्पित किया जाता है। भूलकर भी बासी या जूठा भोजन कौए को न खिलाएं।

कौए के भोजन को लेकर पुराणों में कही गई बात

गरुड़ पुराण के अनुसार एक बार यम देवता ने कोए को वरदान दिया कि जो भी उसे भोजन कराएगा वो भोजन सीधा पूर्वजों को प्राप्त होगा। यही नहीं इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति भी मिलेगी।

मान्यता यह भी है कि कौए के रूप में पूर्वज ही पृथ्वी पर आते हैं और वशजों पर प्रसन्न होकर भोजन ग्रहण करते हैं। इस बात के रहस्य के पीछे एक रामायण की कथा भी है एक बार कौवे ने माता सीता के पैरों में चोंच मार दी जिसे देखकर श्री राम ने अपने बाण से उसकी आंख को क्षति पहुंचा दी।

कौवे को जब इसका पछतावा हुआ तो उसने श्रीराम से क्षमा मांगी और भावविभोर होकर श्री राम ने आशीर्वाद दिया कि कलयुग में जो व्यक्ति सबसे पहले कौए को भोजन कराएगा उसके पूर्वज सदैव प्रसन्न होंगे। उसी समय से यह परंपरा चली आ रही है।

कौवों को खाना खिलाना पूर्वजों के प्रति सम्मान दिखाने और उनकी आत्मा को शांति दिलाने का एक अहम हिस्सा भी माना जाता है।

श्राद्ध का खाना घर के लोग पहले क्यों नहीं खाते?

एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, हिंदू सनातन परंपरा में श्राद्ध पक्ष के दौरान बनने वाला भोजन केवल शारीरिक तृप्ति के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एवं सूक्ष्म ऊर्जा चक्र से जुड़ा होता है।

भोजन से पूर्व निकाला जाने वाला पंचबलि भाग

घर के सदस्य स्वयं भोजन ग्रहण करने से पहले पंचबलि के रूप में इन 5 जीवों व देवों के लिए भोजन निकालते हैं:

देव बलि: पहला भाग अग्नि देव को अर्पित किया जाता है ताकि यह दिव्य शक्तियों तक पहुंचे।

गौ बलि: गाय में सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है, इसलिए दूसरा भाग गाय को अर्पित किया जाता है।

श्वान बलि: कुत्ता यमराज का द्वारपाल और दूत माना जाता है, इसलिए उनके निमित्त भोजन निकाला जाता है।

काक बलि: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कौआ पितरों का संदेशवाहक और प्रतिनिधि माना गया है।

पिपीलिकादि बलि: सूक्ष्म जीवों को भोजन देकर प्रकृति के संतुलन का सम्मान किया जाता है।

पंचबलि और ब्राह्मण भोज के उपरांत ही परिवार के लोग भोजन ग्रहण करते हैं।

पहले भोजन न करने का आध्यात्मिक कारण

श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों की आत्मा को तृप्त करना है। जब तक पितरों और उनके प्रतिनिधियों को भोजन न कराया जाए, तब तक स्वयं भोजन करना पितृ-ऋण और उनके अनादर के समान माना जाता है। मान्यता है कि जब तक पितर तृप्त नहीं होते, तब तक भोजन में केवल साधारण पोषण होता है; पितरों और पंचबलि के उपरांत बचा हुआ भोजन प्रसाद बन जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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