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ब्रह्म हत्या से भी बड़ा पाप कौन-सा है और इसके क्या परिणाम होते हैं?

Published: Thu, 10 Sep 2026 02:35 PM (IST)Updated: Fri, 11 Sep 2026 09:25 AM (IST)

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म हत्या से भी बड़ा पाप भ्रूण हत्या को माना गया है, जिसके गंभीर परिणाम व्यक्ति को सात जन्मों तक भुगतने पड़ते हैं।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार सबसे बड़ा पाप

हिंदू शास्त्रों के अनुसार सबसे बड़ा पाप

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दैनिक जीवन में हमारे द्वारा कर्म करते समय हम उन कर्मों का फल पुण्य और पाप के रूप में भोगते हैं। पुण्य ऐसे फल जो हमें सुख का एहसास कराते हैं, जबकि पाप कर्म हमारे दुख का कारण बनते हैं। पाप बुरे कर्मों का ही फल है, जिससे हमें जीवन में दुख का सामना करना पड़ता है।

हिंदू शास्त्रों में कई तरह के पापों का जिक्र किया गया है, जिसे करने से मनुष्यों को बचने की सलाह दी जाती है। सभी पापों में 'ब्रह्म हत्या' का पाप सबसे बड़ा माना जाता है। लेकिन एक पाप ऐसा भी है, जिसे करने से व्यक्ति को सात जन्मों तक इसे भोगना पड़ता है। आइए जानते हैं इस पाप के बारे में।

ब्रह्म हत्या से भी बड़ा पाप क्या है?

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्म हत्या से भी बड़ा पाप भ्रूण हत्या का पाप है। गर्भ में बच्चे की हत्या करने वाले इंसान को 7 जन्म तक भी इसकी माफी नहीं मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, भ्रूण हत्या ऋषि हत्या के समान है। लोक और परलोक दोनों में ही व्यक्ति को इसकी सजा भुगतनी जरूर पड़ती है।

देवी भागवत पुराण में भ्रूण हत्या के पाप के बारे में कहा गया है कि-

भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते । कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।।

गृध्रो जन्मसहस्राणि शतजन्मानि सूकरः । काकश्च सप्त जन्मानि सर्पश्च सप्तजन्मसु ।।

षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः । नानाजन्मसु स वृषस्ततः कुष्ठी दरिद्रकः ।।

अर्थात्- संन्यासी की हत्या करने वाला तथा गर्भ की हत्या करने वाला महापापी होता है। वह मनुष्य कुंम्भीपाक नरक में 14 इंद्रों के भोगकाल तक यातनाएं झेलता है।

फिर हजार जन्म गीध, सौ जन्म सुअर, सात जन्म कौआ और सात जन्म सांप बनकर बिताता है। फिर 60 हजार सालों तक कीड़ा बनकर जीता है। फिर अनेक जन्मों तक बैल और आखिर में कंगाल और कोढ़ी होता है।

शास्त्रों के अनुसार बच्चे की गर्भ में निर्मम हत्या करने से शरीर रोगों का घर बनता है और परिवार कलह, अशांति एवं दुख की भीषण ज्वालाओं में झुलसने लगता है। प्रसवकाल में मां के शरीर को जितना खतरा होता है, उससे दुगना खतरा उसे गर्भपात कराने से होता है।

पराशर स्मृति में भ्रूण हत्या पाप के संदर्भ में कहा गया है कि-

यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने

अर्थात्- 'ब्रह्म हत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगना पाप गर्भपात करने से लगता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।