जैन धर्म में क्यों जरूरी माना जाता है अपरिग्रह, जरूरत से ज्यादा चीजें रखने के नुकसान क्या हैं?
जैन धर्म में अपरिग्रह पांच महाव्रतों में से एक है, जिसका अर्थ है वस्तुओं का संग्रह न करना और उनसे ...और पढ़ें

जैन धर्म का महाव्रत अपरिग्रह जानें इसका महत्व और पालन न करने के नुकसान (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
अपरिग्रह जैन धर्म के पांच महाव्रतों में से एक।
वस्तुओं का संग्रह न करने और मोह त्यागने का व्रत।
लालच से मुक्ति और मानसिक शांति का मार्ग।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जैन धर्म के पांच महाव्रतों में से एक सबसे महत्वपूर्ण अपरिग्रह को माना जाता है। अपरिग्रह जैन धर्म का वह व्रत है जिसमें चीजों को जमा न करने और उनसे मोह न रखने का संकल्प लिया जाता है।
तत्त्वार्थ सूत्र में परिग्रह को 'मूर्छा' यानी मोह या आसक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि दोष चीजों में नहीं, बल्कि उनसे जुड़े मोह में होता है।
जैन धर्म के साधु-साध्वी पूरी तरह से भौतिक वस्तुओं का त्याग कर देते हैं, जबकि गृहस्थ 'परिग्रह-परिमाण' व्रत के माध्यम से अपनी संपत्ति या चीजों को स्वेच्छा से सीमित कर लेते हैं। आइए आपको बताते हैं जैन धर्म के इस महाव्रत के बारे में और इससे जुडी अन्य बातें जो शायद आप नहीं जानते होंगे।
अपरिग्रह का क्या अर्थ है?
अपरिग्रह का अर्थ है चीजों को जमा न करना या उन पर कब्जा न करना। यह जैन धर्म के पांच महाव्रतों अहिंसा, सत्य, अस्तेय और ब्रह्मचर्य के बाद पांचवां महाव्रत है। इसमें बाहरी संपत्ति और उसे पाने की अंदरूनी इच्छा, दोनों शामिल होते हैं। जैन धर्म के लोग मानते हैं कि चीजों को जमा करने से व्यक्ति का नुकसान हो सकता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब आप कोई चीज जरूरत से ज्यादा इकट्ठी करके रखते हैं तो ये किसी दूसरे व्यक्ति का हक मारने के समान हो सकता है। यह शब्द 'परिग्रह' का उल्टा है, जो उस मूल शब्द से बना है जिसका अर्थ है चारों ओर से पकड़ना।
आमतौर पर जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि चीजों को जमा करने के लिए उन्हें हासिल करते समय किसी न किसी व्यक्ति को नुकसान अवश्य पहुंचाया जाता है। कई बार चीजों के लेन-देन में भी झूठ बोलना पड़ सकता है। यही नहीं ऐसी चीज भी लेनी पड़ सकती है जो सामने वाले ने अपनी इच्छा से नहीं दी होती है। ऐसे में सामने वाले को नुकसान हो सकता है।
अपरिग्रह का पालन न करने का नुकसान क्या है?
अपरिग्रह का मतलब हमेशा किसी चीज का त्याग करना होता है और जब आप अपरिग्रह का पालन नहीं करते हैं तब यह नुकसान पहुंचा सकता है। इसके कई कारण होते हैं जैसे जरूरत से ज्यादा चीजों का संग्रह मन में लालच का भाव जागृत करता है, जब कोई व्यक्ति किसी और की चीजें भी अपने पास रख लेता है तो यह किसी जरूरतमंद का हक मारने के समान हो सकता है।
वैसे तो धन संचय जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा धन अर्जित करके संग्रह करना मन में लालच लाता है जो आपके मानसिक विचारों को बिगाड़ सकता है और महाव्रतों को तोड़ सकता है।
जैन धर्म में मुख्य रूप से साधु और साध्वियों में अपरिग्रह का पालन जरूरी माना जाता है। इसे परमात्मा की प्राप्ति का एक साधन माना जाता है और इसका पालन न करने से मन में लालच का भाव आ सकता है जो व्यक्ति को मानसिक रूप से नुकसान पहुंचाता है।
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