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जैन धर्म के 5 महाव्रत कौन से हैं? अहिंसा से अपरिग्रह तक, इनका गहरा आध्यात्मिक महत्व 

Published: Tue, 04 Aug 2026 08:00 PM (IST)

जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पांच महाव्रतों का पालन महत्वपूर्ण बताया गया है। ये महाव्रत ...और पढ़ें

जैन धर्म के पांच महाव्रत: मोक्ष का मार्ग और आध्यात्मिक उन्नति का आधार (Picture Credit: AI Generated)

जैन धर्म के पांच महाव्रत: मोक्ष का मार्ग और आध्यात्मिक उन्नति का आधार (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जैन धर्म में मोक्ष पाने के लिए कुछ विशेष प्रकार के व्रतों का वर्णन किया गया है। ये मनुष्य को ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ाते हैं और सही आचरणों की तरफ प्रेरित करते हैं।

इस धर्म के अनुसार, सभी लोगों को इन महाव्रतों का पालन जरूर करना चाहिए जिससे उन्हें ईश्वर की प्राप्ति हो सके और यही नहीं वो दूसरों के लिए भी प्रेरणादायी बनें।

किसी भी व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए सही ज्ञान, सही विश्वास और सही आचरण इन तीनों चीजों का होना सबसे जरूरी होता है। इन सभी को पाने के लिए व्यक्ति को अपने जीवन में पांच महाव्रतों का पालन करने की सलाह दी जाती है। आइए आपको बताते हैं जैन धर्म के 5 महाव्रतों और उनके महत्व के बारे में।

जैन धर्म के पांच महाव्रत

जैन धर्म में पांच महाव्रतों का विशेष महत्व है और ये महाव्रत-अहिंसा, सत्य, अचौर्य (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यानी कि चीजों का मोह त्याग देना हैं। इस धर्म में मान्यता है कि जो व्यक्ति इन सभी महाव्रतों का पालन करता है उसके जीवन में खुशहाली रहती है और वो मोक्ष की प्राप्ति करता है। इन महाव्रतों का महत्व क्या है इसके बारे में जानें-

अहिंसा का पालन करना

जैन धर्म के महाव्रतों में अहिंसा का मुख्य सिद्धांत है इसलिए इसे जैन धर्म की आधारशिला माना जाता है। इन लोगों के लिए अहिंसा ही परम धर्म माना जाता है और ये अहिंसा परमो धर्मः का पालन करते हैं। जैन साहित्य जैसे आगम साहित्य में इस बात का जिक्र बार-बार किया जाता है कि जैन धर्म के अनुयायियों को कभी भी किसी प्राणी को हानि नहीं पहुंचानी चाहिए।
इस धर्म के अनुसार, सभी जीव - चाहे उनका आकार, रूप या आध्यात्मिक विकास कैसा भी हो सब एक समान हैं। इस महाव्रत का पालन करने के लिए जैन अनुयायी मुख पर पट्टी बांधते हैं।

सत्य का पालन करना

जैन धर्म के दूसरे महाव्रतों में सत्य का पालन करना है। जैन अनुयायी किसी भी परिस्थिति में सत्य का पालन करने पर ही जोर देते हैं। उनका मानना है कि हमेशा सच बोलने के लिए नैतिक साहस जरूरी होता है।

इस महाव्रत का पालन वही लोग कर सकते हैं जिनके मन में लालच, डर, क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार की भावना न हो। जैन धर्म के लोग हमेशा सच का साथ देने पर जोर देते हैं। उनके अनुसार किसी भी व्यक्ति को सत्य का पालन मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।

अचौर्य या चोरी न करना

जैन धर्म के महाव्रतों में से एक है चोरी न करने के धर्म का पालन करना। उनका मानना है कि व्यक्ति को कभी किसी भी परिस्थिति में चोरी नहीं करनी चाहिए और न ही किसी ऐसे व्यक्ति का साथ देना चाहिए जो इस बुरे कर्म का आचरण करता हो। व्यक्ति को कभी भी ऐसी कोई चीज नहीं लेनी चाहिए जो उसकी अपनी न हो। किसी दूसरे की चीज भी बिना उसकी अनुमति के उठा लेना चोरी के समान ही है।

ब्रह्मचर्य का पालन करना

जैन अनुयायियों के अनुसार व्यक्ति को हमेशा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इसका मतलब यह है कि लोगों को अपनी पांचों इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए।

इंद्रिय-सुख से दूर रहकर अच्छे आचरण की ओर आगे बढ़ना ही जैन धर्म के लोगों का कर्तव्य माना जाता है। हालांकि, यह महाव्रत केवल जैन साधु और साध्वियों पर ही लागू होता है। यह नियम गृहस्थ जीवन यापन करने वाले जैन अनुयायियों के लिए नहीं है।

अपरिग्रह का पालन करना

जैन धर्म के पांचवां महाव्रत है अपरिग्रह जिसका मतलब होता है सांसारिक मोह माया को त्याग देना। जैन धर्म के लोगों का मानना है कि किसी व्यक्ति के पास जितनी अधिक सांसारिक संपत्ति होती है, उतनी ही उसकी आसक्ति मोह माया में बढ़ जाती है।

सांसारिक वस्तुओं से जन्म-मरण के चक्र में बंधने का कारण मिलता है। इसलिए, जो व्यक्ति आध्यात्मिक मुक्ति चाहता है, उसे अपनी सभी इंद्रियों को सुख देने वाली वस्तुओं के प्रति मोह त्याग देना चाहिए और संपत्ति सुख को भी ध्यान में नहीं रखना चाहिए।

ये जैन धर्म के पांच महाव्रत हैं जिनका पालन जैन धर्म के अनुयायी शक्ति से करते हैं और इन्हें मोक्ष का द्वार मानते हैं। हालांकि, इन महाव्रतों का पालन जैन साधु-साध्वियों के लिए अनिवार्य माना जाता है, आम लोगों के लिए नहीं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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