मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है? भगवत गीता में श्री कृष्ण ने बताया है यह रहस्य
महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए मृत्यु के बाद आत्मा के रहस्य ...और पढ़ें

HighLights
आत्मा अविनाशी है, शरीर नष्ट होने पर भी नहीं मरती।
कर्मों के अनुसार आत्मा को स्वर्ग या नरक मिलता है।
पृथ्वी लोक कर्मभूमि है, जहां कर्मों का फल मिलता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी जानते हैं कि कुरुक्षेत्र के मैदान में जब महाभारत का युद्ध शुरु होने वाला था उस समय अर्जुन का अंतर मन अत्यंत व्यथित था और वह अपने और पराए के बीच भेद नहीं समझ पा रहे थे। ऐसे में श्री कृष्ण ने उन्हें जीवन मरण और हानि लाभ का अर्थ बताया।
अर्जुन सामने खड़ी सेना के विरुद्ध शस्त्र उठाने से घबरा रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की व्यथा को दूर करने के लिए गीता का ज्ञान दिया। उसी ज्ञान में श्रीकृष्ण ने बताया कि मृत्यु के बाद मनुष्य की आत्मा का क्या होता है? यही नहीं इसके बारे में भी बताया कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है और किस तरह से मनुष्य को अपने कर्मों का फल मिलता है? श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इस सृष्टि के प्राणियों को मृत्यु के पश्चात अपने अपने कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है।
मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है?
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद उसका स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा का नाश नहीं होता। आत्मा को अविनाशी और शाश्वत बताया गया है। गीता में इसके लिए एक श्लोक भी लिखा है-
'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:'
इस श्लोक का मतलब है कि- आत्मा को कोई भी शस्त्र छेद नहीं सकता यानी उसके टुकड़े नहीं किए जा सकते, न ही अग्नि आत्मा को जला सकती है, न ही जल द्वारा उसे गीला कर सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है।' इस प्रकार आत्मा अजर अमर है। ऐसे में मृत्यु के बाद आत्मा एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है।
मनुष्य को मिलता है कर्मों का फल
श्री कृष्ण गीता में बताते हैं कि मनुष्य को मृत्यु के बाद अपने कर्मों का फल मिलता है। वह जीवन में जैसे कर्म करता है, उसी के अनुसार उसे आगे के अनुभव प्राप्त होते हैं। पुण्य और पाप कर्मों के आधार पर जीवात्मा को अलग-अलग अवस्थाओं और योनियों का अनुभव करना पड़ता है। इसी कारण से मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक शरीर से दूसरे शरीर तक जाने की यात्रा माना गया है।
आत्मा को सुख-दुख का अनुभव क्यों नहीं होता है?
अर्जुन ने श्री कृष्ण से एक सवाल यह भी किया कि 'मृत्यु के बाद जीव को स्वर्ग या नरक में सुख-दुख भोगना पड़ता है, तो क्या आत्मा भी उन सुख-दुखों का अनुभव करती है? इस सवाल के उत्तर में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि आत्मा स्वयं सुख-दुख से परे है। सुख और दुख का अनुभव शरीर और मन के स्तर पर होता है। आत्मा तो अविनाशी है, इसलिए उसके ऊपर किसी भी सुख या दुःख का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
गीता में श्री कृष्ण ने आत्मा को अजर अमर बताते हुए उसकी यात्रा का वर्णन किया है और कर्मों के फल के बारे में भी विस्तार से बताया है।
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