यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 04, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
तब से महाकाल महेश्र्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए वहीं विराज गए
असुर ने ज्योंही उन शिव भक्तों के प्राण लेने के लिए शस्त्र उठाया,एक गढ्डे से शिवजी प्रकट हो गए। तुम जैसे हत्यारों के लिए ही मैं महाकाल प्रकट हुआ हूं।

उज्जैन का महाकाल ज्योतिर्लिंग एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। शिव पुराण में इसके बारे में उल्ल्ेाख है। अवंती नगरी में वेदों को जानने वाले एक ब्राह्मण वेदप्रिय रहा करते थे। शिवजी के भक्त वेदप्रिय रोज अपने घर में स्थापित शिवलिंग की पूजा-उपासना किया करते थे। वेदप्रिय को चार पुत्र थे।
उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण' नाम के एक असुर ने धर्मात्माओं पर आक्त्रमण कर दिया। उसे ब्रह्मा से अजेय होने का वर मिला हुआ था। उसने अवन्ति (उज्जैन) पर भी चढ़ाई कर दी। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य भयंकर उपद्रव करने लगे। इससे अवंति के सभी लोग भयभीत हो गए, लेकिन वेदप्रिय और उनके चारों पुत्र तनिक भी नहीं डरे। पांचों मिलकर शिव की पूजा और मंत्रोच्चार करने लगे। दूषण ने जब उन ध्यानमग्न ब्राह्मणों को देखा, तो उन सभी को मारने के लिए दौड़ा। इससे वे पांचों तनिक भी विचलित नहीं हुए और निरंतर शिव की पूजा करने लगे।
असुर ने ज्योंही उन शिव भक्तों के प्राण लेने के लिए शस्त्र उठाया, त्योंही एक गढ्डे से शिवजी प्रकट हो गए। उन्होंने असुरों से कहा-तुम जैसे हत्यारों के लिए ही मैं महाकाल प्रकट हुआ हूं। तब से महाकाल महेश्र्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए वहीं विराज गए।
