शादी के बाद नई दुल्हन की क्यों होती है पहली रसोई की रस्म? ज्योतिषाचार्य ने बताया इसका असली महत्व
हिंदू धर्म में शादी के बाद नई दुल्हन की पहली रसोई की रस्म का विशेष महत्व है, जो उसके नए ...और पढ़ें

क्या है नई दुल्हन की पहली रसोई की रस्म? (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शादी के बाद बहु की पहली रसोई का अधिक महत्व है। इसे नई वधू के नए घर में स्वागत और उसके तालमेल का एक सुंदर प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा हिंदू धर्म में प्राचीन समय से चली आ रही है और वर्तमान में भी इस परंपरा को अधिक महत्व दिया जाता है। विवाह के बाद जब दुल्हन अपने ससुराल आती है, तो उसके द्वारा यह रस्म करवाई जाती है।
इस दौरान बहु से रसोई में परिवार के सभी सदस्यों के लिए कुछ मीठा बनवाया जाता है, क्योंकि हिंदू धर्म में मीठा बनाने को शुभता और रिश्तों में मिठास घोलने का प्रतीक माना गया है।
अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर शादी के बाद बहु की पहली रसोई की रस्म क्यों होती है? इसके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको एस्ट्रोपत्री के श्री चंद्रेश शर्मा जी के अनुसार बताते हैं इस रस्म की वजह के बारे में।
एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषियों के अनुसार, भारतीय संस्कृति में भोजन केवल शारीरिक पोषण का साधन नहीं, बल्कि अन्नपूर्णा का स्वरूप और पारिवारिक संबंधों को जोड़ने वाला मुख्य माध्यम माना गया है।
पहली रसोई की रस्म का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
पोषण की जिम्मेदारी का प्रतीक: विवाह के बाद वधू जब पहली बार रसोई घर में प्रवेश करती है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि वह अब घर के पोषण और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभाल रही है।
मिठास और सौहार्द का संचार: पारंपरिक रूप से पहली रसोई में केवल मीठा (जैसे हलवा या खीर) ही बनाया जाता है। मान्यता है कि मीठे भोजन से नए परिवार के सदस्यों के बीच मधुरता, प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
देव पूजन और आशीर्वाद: भोजन तैयार होने के पश्चात सबसे पहले कुलदेवता या अग्नि देव को भोग लगाया जाता है। इसके बाद परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को परोसा जाता है, जो प्रसन्न होकर वधू को उपहार या नेग और सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद देते हैं।
हिंदू धर्म में विवाह के बाद नववधू की पहली रसोई गृहस्थ जीवन की शुरुआत की एक शुभ रस्म है। इसमें नई दुल्हन ससुराल में पहली बार मां अन्नपूर्णा का ध्यान कर खीर या हलवा जैसा मीठा भोजन बनाती है। भगवान को भोग लगाने के बाद बुजुर्गों को खाना परोसकर शगुन उपहार लिया जाता है।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।
