भगवान को भोग क्यों लगाया जाता है और वे इसे कैसे ग्रहण करते हैं, इसके पीछे का शास्त्र सम्मत रहस्य क्या है?
भगवान को भोग क्यों लगाया जाता है और वे इसे कैसे स्वीकार करते हैं? जानिए पंचतत्वों के गूढ़ रहस्य, गीता ...और पढ़ें

भगवान को भोग लगाने की परंपरा क्यों है? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पूजा-पाठ के दौरान भगवान को फल, मिठाई या घर का बना सात्विक भोजन अर्पित करना हमारी सनातन परंपरा का एक अहम हिस्सा है। कुछ लोग श्रद्धा से केवल जल या तुलसी पत्र चढ़ाते हैं, तो कुछ 56 भोग तैयार करते हैं।
लेकिन, क्या आपने सोचा है कि भगवान भोजन को ग्रहण कैसे करते हैं? और, अगर वो लगाए भोग को खाते ही नहीं तो फिर यह नियम बनाने की क्या मकसद होगा? चलिए जानते हैं आपके प्रेम से लगाए गए भोजन को भगवान इसे स्वीकार कैसे करते हैं?
भोग ग्रहण करने का तरीका
शास्त्रों में इस सवाल का बहुत ही सुंदर और तार्किक जवाब मिलता है। हमारा इंसानी शरीर पंचतत्वों- जल, पृथ्वी, आकाश, वायु और अग्नि से मिलकर बना है। इसलिए, हम अन्न और जल को भौतिक रूप से खा-पी सकते हैं।
दूसरी ओर, देवी-देवताओं का स्वरूप सूक्ष्म और वायुमय माना गया है। उनके पास हमारी तरह दिखने वाला शरीर नहीं है। इसलिए वे पंचतत्वों के सूक्ष्म रूपों के माध्यम से ही भोग को स्वीकार करते हैं:
वायु तत्व: ईश्वर आपके बनाए भोजन को धूप और फूल की पवित्र 'सुगंध' को वायु के रूप में ग्रहण करते हैं और इसी से तृप्त होते हैं।
तेज तत्व: जब हम भगवान के सामने दीपक जलाते हैं या यज्ञ करते हैं, तो भगवान भी उसे 'प्रकाश' के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।
आकाश तत्व: आरती, मंत्र जप, घंटी और शंख की 'ध्वनि' को ईश्वर आकाश तत्व के माध्यम से ग्रहण करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में क्या कहा गया है?
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
अर्थ- श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय (श्लोक 26) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भक्त प्रेम और निष्काम भाव से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उस शुद्ध मन वाले भक्त का उपहार खुशी-खुशी स्वीकार कर लेता हूं।
इसके अलावा श्रीमद्भगवद्गीता के 7वें अध्याय का 9वां श्लोक है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी उपस्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं:
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
अर्थ- मैं पृथ्वी की पवित्र (सोंधी) सुगंध हूं, अग्नि का तेज (प्रकाश और ऊष्मा) हूं, संसार के समस्त जीवों का जीवन (प्राण) हूं और तपस्वियों का तप हूं।
भोग के पीछे का असली भाव
धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान को भोग लगाने में भोजन से ज्यादा भक्त की 'मंशा' और 'कृतज्ञता' मायने रखती है। भगवान भाव के भूखे हैं, जब हम ईश्वर के आगे थाली रखते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि हे प्रभु! जो कुछ भी मेरे पास है, वह आपका ही दिया हुआ है।
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