डा. विजय अग्रवाल। यह भारतीय दर्शन की विराटता एवं उसकी गहरी लोकतांत्रिक दृष्टि का ही परिणाम है कि यहां हमें ब्रह्म की अवधारणा के कई-कई रूप देखने को मिलते हैं। आरंभिक वैदिक दर्शन में यह प्रकृति के रूप में है, तो उपनिषदों में इसे विशुद्ध चेतना के रूप में देखा गया। उपनिषदों और पुराणों के संधिकाल में इसे एक परम आत्म तत्व (परमात्मा) के रूप में व्याख्यायित किया गया। पुराणों में आते-आते इसी ब्रह्म ने कई रूप (सगुण) धारण कर लिये।

दरअसल, यही भारतीय विचार प्रणाली, जीवन-पद्धति तथा संस्कारों की मूल जमीन है। यदि हम सगुण- भक्ति परंपरा को छोड़ दें, तो ब्रह्म के प्रत्येक स्वरूप के केंद्र में हमें व्यक्ति की निजता की स्पष्ट उपस्थिति दिखाई देती है। आधुनिक आध्यात्मिक चिंतन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले अद्वैतवाद के प्रवर्तक शंकराचार्य ने यह उद्घोष करके कि चूंकि मैं एक विशुद्ध चेतना हूं, इसलिए मैं शिव हूं, स्वावलंबन की भावना को एक नई ऊंचाई प्रदान की। अपने प्रसिद्ध स्त्रोत 'निर्वाण षटकम' में वे कहते हैं, 'न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञा: चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम'।

शंकराचार्य के मात्र 12 शब्दों वाले इस कथन में हमें स्वावलंबन के कई आयाम दिखाई पड़ते हैं। यहां उन्होंने व्यक्ति के लिए मंत्र, तीर्थ, वेद तथा यज्ञ जैसे सभी बाह्य अवलंबों को साफ-साफ नकारा है। मुझे इनकी आवश्यकता नहीं है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि मैं स्वयं में ही शिव हूं। स्वयं में संपूर्ण हूं। इससे जुड़े शब्द 'शिवोहम' का उच्चारण भी वे एक बार नहीं, बल्कि दो बार करके व्यक्ति में निहित ब्रह्मांडीय शक्ति को बार-बार रेखांकित करते हैं। क्या यह अद्भुत नहीं है?

बाद में अद्वैतवाद का दर्शन रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद के माध्यम से हमारी भक्ति परंपरा की नींव बना। इस भक्ति परंपरा में भी यदि हम दास्य भक्ति को छोड़ दें, जिसमें भक्त अपने भगवान के सामने नि:सहाय और निर्बल होकर सर्वस्व समर्पण करता है, तो अन्य पद्धतियों में वह उसके समकक्ष या उसके आसपास होता है। वात्सल्य भक्ति में ईश्वर भक्त के लिए पुत्र तुल्य हो जाते हैं। यह भारतीय स्वावलंबन की एक अद्भुत मिसाल है।

गीता में स्वावलंबन एवं स्वाभिमान, चेतना के ये दोनों रूप 'स्वधर्म' के रूप में उपस्थित हैं। वहां 'धर्म' आज के 'रिलीजन' के अर्थ में नहीं है। यह प्रत्येक प्राणी में मौजूद प्रकृतिप्रदत्त गुण के रूप में है। अपने इस प्राकृतिक गुण को निभाना ही 'धर्म' है। यहां भी हमें व्यक्ति एक संपूर्ण इकाई के रूप में दिखाई देता है। 'संपूर्ण इकाई' कहने का अर्थ है कि, 'यद्यपि मैं एक ही हूं, लेकिन इस एक में ही मैं संपूर्ण हूं' यानी कि मैं जिस पर आधारित हूं, वह स्वयं मैं ही हूं।

आरंभ से ही यह भारतीय दर्शन का बीज-तत्व रहा है। यह बहुत स्वाभाविक था कि इस बीज तत्व की परिणति 'सादा जीवन उच्च विचार' में हो। और यह हुआ भी। इसका फैलाव इतना व्यापक रहा कि इसने अपने आलिंगन में राजा से लेकर उसकी संपूर्ण प्रजा तक को समेट लिया। राजा जनक इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं। उनकी इसी जीवन पद्धति ने उन्हें 'विदेह' विशेषण से विभूषित किया। विदेह यानी वह, जो देह में रहकर भी देह में नहीं है।

यहां तक कि हमारे ऋषि-मुनियों, जिन्हें हम आज की भाषा में ज्ञानी, दार्शनिक और विज्ञानी आदि कहते हैं, उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे भी सादगी के जीवन के द्वारा समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे और उन्होंने ऐसा किया भी। बहुत से विचारक भारत की इस जीवन-पद्धति को एक पलायनवादी दर्शन मानते हुए इसे भौतिक जीवन का विरोधी मानते हैं। लेकिन आरंभिक मध्यकाल तक की हमारी भौतिक समृद्धि की स्थिति उनकी इस स्थापना को स्पष्ट रूप से झुठलाती है। इस समय तक विश्व व्यापार में हमारी भागीदारी एक चौथाई के आसपास थी। यहां तक कि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के बारे में उपलब्ध हमारे ग्रंथ यह बताते हैं कि हमारा आध्यात्मिक चिंतन कभी भी भौतिक समृद्धि और विज्ञान का विरोधी नहीं रहा है। यदि हम स्वावलंबन की बात करते हैं, तो यह स्वावलंबन जीवन के सभी क्षेत्रों को समेटकर चलता है।

इसका एक अच्छा प्रमाण हमें अपने लोक जीवन में देखने को मिलता है। उन्हें भारतीय दर्शन का ज्ञान नहीं है, लेकिन फिर भी वे स्वावलंबन एवं स्वाभिमान के इस विचार को जीते हैं। ऐसा वे अनजाने में करते हैं और ऐसा उनसे अनायास ही होता रहता है। चेतना की यह स्थिति तब बनती है, जब लंबी परंपरा से चली आ रही कोई पद्धति हमारे अवचेतन मन का अभिन्न हिस्सा बन जाती है।

जब अंग्रेज यहां आये, तब वे भारतीय चेतना की इस दृढ़ता से घबरा गये थे। इसलिए उन्होंने इसे तोडऩे का चौतफा हरसंभव प्रयास किया। उन्हें इसमें काफी कुछ सफलता मिली भी, लेकिन उनके इन कुटिल प्रयासों के समानांतर इसके विरोध में एक भारतीय धारा भी प्रवाहित थी। स्वामी दयानंद सरस्वती का नारा 'वेदों की ओर लौट चलो' इसका सर्वोत्तम साक्षी है। विवेकानंद जैसे विचारक तथा तिलक एवं गांधी जैसे राजनेता इस बारे में बहुत सतर्क थे। गांधी जी के तो राजनीतिक एवं आर्थिक दर्शन का आधार ही 'स्वावलंबन' था। विवेकानंद एवं तिलक के विचारों के केंद्र में था- स्वाभिमान। इसके कारण ही हमारा स्वतंत्रता आंदोलन मात्र एक राजनीतिक आंदोलन न होकर संपूर्ण भारतीय चेतना की मुक्ति के आंदोलन का रूप ले सका। इस दृष्टि से भी यह प्रयास वैश्विक इतिहास का एक अनोखा प्रयास रहा है।

हमें स्वाधीनता मिली। हमने अपना संविधान बनाया और इसके बाद से अधिकांश भारतीय जन चेतना स्वावलंबन एवं स्वाभिमान की अपनी मूल चेतना की पुनप्र्राप्ति की कोशिश में जुट गई। अब, जबकि हम अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, ये दोनों ही फिर से प्रस्फुटित होकर एक पुष्ट पौधे का रूप धारण कर चुके हैं। हम भारत के लोगों को अब इस परिणाम पर दृढ़ विश्वास है कि 25 वर्षों के बाद जब हम स्वतंत्रता की शताब्दी का अमृत उत्सव मना रहे होंगे, तब तक यह पौधा एक अच्छे-खासे संपूर्ण वृक्ष के रूप में परिवर्तित होकर फल-फूल रहा होगा। यह वही स्थिति होगी, जिसकी चर्चा हमें अपने प्राचीनकालीन इतिहास में पढऩे को मिलती है, भारत के विश्व गुरु होने की चर्चा।

अंत में यह कि क्या स्वावलंबन के बिना स्वाधीनता संभव है? साथ ही यह भी कि क्या स्वाधीनता के बिना स्वाभिमान संभव है? इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि- नहीं। तो आइए, हम अपने स्वावलंबन को मजबूती दें, ताकि हमारी स्वाधीनता मजबूत हो सके।

[आध्यात्मिक विषयों के लेखक]

Edited By: Sanjay Pokhriyal