शिव पुराण: क्यों लेना पड़ा महादेव को शरभ अवतार? जब आमने-सामने आ गए थे शिव और भगवान विष्णु
आइए इस आर्टिकल में भगवान शिव के सबसे भयंकर शरभ अवतार की कथा पढ़ते हैं, जो बेहद कल्याणकारी है।

Sharabha Avatar Katha: जब नरसिंह देव से टकराए थे महादेव।

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव और भगवान विष्णु एक-दूसरे के परम भक्त हैं, लेकिन एक ऐसा समय भी आया था, जब ब्रह्मांड की रक्षा के लिए इन दोनों महाशक्तियों को आमने-सामने आना पड़ा।
शिव पुराण के अनुसार, यह अद्भुत घटना तब घटी जब भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को शांत करने के लिए महादेव को अपने सबसे शक्तिशाली और भयंकर शरभ अवतार में प्रकट होना पड़ा था। आइए जानते हैं इस महायुद्ध के पीछे की पूरी पौराणिक कथा।
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जब शांत नहीं हुआ भगवान नरसिंह का क्रोध
''पक्षसिंहमृगाकारं शलभं लोकपावनम्।
अष्टपादं महावीर्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं नखाकरम्।।''
शिव पुराण की कथा के अनुसार, दैत्यराज हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने आधा सिंह और आधा मनुष्य का यानी नरसिंह अवतार धारण किया था। हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका भयंकर रौद्र रूप देखकर
देवताओं को डर लगने लगा कि अगर नरसिंह देव का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो पूरी सृष्टि का विनाश हो जाएगा। सभी देवता रक्षा के लिए देवों के देव महादेव की शरण में पहुंचे।
शिव जी का दूत भेजना और फिर शरभ अवतार
सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने पहले अपने अंशावतार वीरभद्र को नरसिंह देव को शांत करने के लिए भेजा। वीरभद्र ने नरसिंह जी से शांत होने की विनती की, लेकिन क्रोध की वजह नरसिंह देव ने उनकी बात नहीं मानी।
जब कोई उपाय नहीं बचा, तब भगवान शिव खुद साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने एक ऐसे जीव का रूप धारण किया जो आधा सिंह, आधा पक्षी (चील) और आठ पैरों वाला था। इस रूप में उनके पंख बहुत विशाल और पंजे नुकीले थे। इसी रूप को शरभ कहा गया।
दोनों महाशक्तियों के बीच हुआ अद्भुत महायुद्ध
''त्वं हि ब्रह्मा च विष्णुश्च त्वं हि सर्वं चराचरम्।
क्षमस्व सर्वदेवेश शरभाकृत ईश्वर।।''
जब शरभ अवतार और नरसिंह देव आमने-सामने आए, तो दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। शिव पुराण के अनुसार, शरभ देव ने अपनी विशाल शक्ति से भगवान नरसिंह को अपने पंजों में दबोच लिया और उन्हें आकाश में ले गए। जब नरसिंह देव ने शिव जी के इस रूप की असीम शक्ति को देखा, तो उनका क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा।
उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ कि वे खुद नारायण हैं और यह लीला सृष्टि की रक्षा के लिए ही रची गई है। शांत होने के बाद नरसिंह देव ने महादेव को नमन किया और अपने बैकुंठ धाम लौट गए।
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