शारदीय नवरात्र में क्यों होती है सांझी माता की पूजा? यहां समझें इस लोक परंपरा का महत्व
शारदीय नवरात्र में उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में सांझी माता की पूजा का विशेष महत्व है। गोबर और मिट्टी ...और पढ़ें

क्यों बनाई जाती हैं सांझी माता की आकृतियां? (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) का विशेष महत्व है। यह उत्सव मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से हो रही है।
इस अवधि के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में कई लोक परंपराएं भी निभाई जाती हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है शारदीय नवरात्र के दौरान सांझी माता की पूजा। उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में शारदीय नवरात्र में सांझी माता (Sanjhi Mata) की पूजा-अर्चना करने का विधान है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गोबर और मिट्टी से सांझी माता की आकृतियां बनाई जाती हैं, जिसके बाद महिलाएं और कुंवारी कन्याएं लोकगीत गाकर सांझी माता की विशेष पूजा-अर्चना करती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों की जाती है सांझी माता की पूजा और इसका क्या महत्व है? अगर नहीं पता, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।
कहां होती है सांझी माता की पूजा?
शारदीय नवरात्र के दौरान हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दीवार पर गोबर से सांझी माता की आकृतियां बनाई जाती हैं और उन्हें फूलों-पत्तियों से सजाया जाता है।
परंपरा के अनुसार, सांझी माता को देवी दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। जब नवरात्र में धरती पर मां दुर्गा का आगमन होता है, तो दीवारों पर उनकी स्थापना कर उनका स्वागत किया जाता है। साथ ही सांझी माता की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है।
कुंवारी कन्याएं नवरात्र में सांझी माता की आकृति बनाकर पूजा करती हैं। मान्यता है कि सांझी माता की साधना करने से मनचाहा पति मिलता है और वैवाहिक जीवन में खुशियों का आगमन होता है।
कब होता है सांझी माता का विसर्जन?
नवरात्र में रोजाना शाम को महिलाएं और कन्याएं एक जगह एकत्र होकर सांझी माता की आरती करती हैं और लोकगीत गाती हैं। इसके बाद दशहरे के दिन या नवरात्र के अंतिम दिन सांझी माता की आकृति को दीवार से हटाकर उसे विधिपूर्वक पवित्र नदी या सरोवर में विसर्जित कर दिया जाता है।
यह भी पढ़ें- 11 अक्टूबर से शुरू होंगे शारदीय नवरात्र, व्रत रखने से पहले पढ़ें क्या खाएं और क्या छोड़ेंं
यह भी पढ़ें- Navratri 2026: शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक इन 9 देवियों को चढ़ाएं ये फूल, हर मनोकामना होगी पूरी
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
