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वानर सेना की विदाई और प्रभु श्री राम का इंतजार, शरद पूर्णिमा से दीवाली तक के 15 दिनों का रहस्य कर देगा भावुक

By Jagran NewsEdited By: Samvida Tiwari
Published: Sun, 25 Oct 2026 11:07 AM (IST)

शरद पूर्णिमा चंद्रमा की निर्मलता और अमृत वर्षा का अद्वितीय पर्व है, जो वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह ...और पढ़ें

शरद पूर्णिमा: वानर सेना की विदाई और राम की अयोध्या वापसी का भावुक रहस्य (Picture AI Generated)

शरद पूर्णिमा: वानर सेना की विदाई और राम की अयोध्या वापसी का भावुक रहस्य (Picture AI Generated)

HighLights

  1. शरद पूर्णिमा चंद्रमा की अमृत वर्षा का पर्व है।

  2. यह राम की अयोध्या वापसी की प्रतीक्षा का प्रतीक है।

  3. वानर सेना की विदाई भारतीय कृतज्ञता दर्शाती है।

मालिनी अवस्थी, लखनऊ। हम मूलतः प्रकृति उपासक हैं। हम नदी की पूजा करते हैं, वृक्ष की पूजा करते हैं, सूर्य की पूजा करते हैं। पर विश्व में ऐसा कोई दूसरा पर्व नहीं मिलेगा, जहां चंद्रमा की निर्मलता की पूजा होती हो, जहां चंद्रमा की किरणों को अमृत वर्षा माना गया हो, शरद माह की पूर्णिमा, आनंदउत्सव की रात्रि के रूप में मनाई जाती हो।

यदि पर्व त्योहार भारत के प्राण हैं तो उनमें शरद पूर्णिमा का पर्व अमृत प्रदायक है। शरद पूर्णिमा भारतीय पर्व-परंपरा में अपने वैशिष्ट्य के कारण एक अलग ही स्थान रखती है। शरद पूर्णिमा अर्थात आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा। वर्षा ऋतु विदा ले चुकी होती है। आकाश धुल चुका होता है।

बादल निर्मल हो चुके होते हैं और इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर धरती पर उतर आता है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात को चांद की किरणों से अमृत बरसता है। यह केवल काव्यात्मक कल्पना नहीं, एक गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य भी है। आयुर्वेद कहता है कि इस रात चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और उसकी किरणों में औषधीय गुण होते हैं। इसीलिए इस रात खीर बनाकर चांदनी में रखी जाती है, ताकि वह अमृत-किरणों को सोख ले।

यह खीर जब अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है, तो वह शरीर और मन दोनों को शीतल करती है। हमारी दासी हमसे कहती थी कि शरद पूर्णिमा की रात्रि चांदनी के प्रकाश में सुई में धागा डालने से नैनो की ज्योति अच्छी होती है। यह हमारे पूर्वजों का प्रकृति से जुड़ने का अद्भुत विज्ञान था। भगवदपुराण में श्री कृष्ण राधा रानी एवं गोप गोपिकाओं का शरद पूर्णिमा की रात्रि चन्द्रिका की शीतल छाया में यमुना किनारे नृत्य संगीत के साथ रास रचाने का उल्लेख मिलता है। इस दिव्य कल्पना ने अशेष लालित्यपूर्ण साहित्य को जन्म दिया है।

आजु गोपाल रासरस खेलत, पुलिनकल्प तरुतीर री सजनी।
शरद विमल नभ चंद्र विराजत, रंग भीनी रजनी॥

परमानंद जी का एक सुन्दर रास कीर्तन अत्यंत लोकप्रिय है,

ब्रजबनिता मध्य रसिक राधिका, बनी शरद की राति हो।
नृत्यत तत थेई गिरिधर नागर, गौर श्याम अंग कांति हो॥
एक एक गोपी बिचबिच माधौ, बनी अनूपम भांति हो।
जयजय शब्द उच्चारत सुरमुनि, कुसुमन बरख अघाति हो॥
निरखि थक्यौ शशि आयौ शीश पर, क्यों हूँ न होत प्रभात हो।
परमानंद प्रभु मिलै यह अवसर, बनी है आज की बात हो

शरद पूर्णिमा का सबसे हृदयस्पर्शी सबसे सुन्दर और कम चर्चित प्रसंग है कपियों की विदाई। यह प्रसंग रामकथा से जुड़ा है। जब भगवान राम लंका में रावण को पराजित करके अयोध्या लौटने लगे, तो उनके साथ वानर सेना भी थी, जो हिमालय से लेकर समुद्र तक उनके साथ लड़ी थी। अयोध्या में भरत प्रतीक्षा कर रहे थे।

एक मर्यादित राज्य में सेना का अनावश्यक प्रवेश उचित नहीं था। इसलिए अयोध्या पहुंचने से पहले ही भगवान राम ने अपनी वानर सेना को, अपने सखाओं को विदा किया। यह विदाई का क्षण अत्यंत मार्मिक था। वर्षों तक साथ लड़े, साथ रोए, साथ हंसे। सुग्रीव, अंगद, जामवंत, हनुमान... सबकी आंखें नम थीं। राम ने सबको गले लगाया, आशीर्वाद दिया और कहा - जाओ, अपने-अपने लोक में जाओ। यह प्रसंग आज भी भारत की जीवंत रामलीलाओं में देखा जा सकता है। 

कपि सब रोवत प्रेम बस, गदगद भइ सब देह।
प्रभु पद पंकज पकरि पकरि, बार-बार गहि नेह।।

शरद पूर्णिमा के आसपास जब रामलीलाएं अपने अंतिम चरण में होती हैं, तो कपियों की विदाई का पूरा मंचन होता है। ढोल-नगाड़ों के बीच जब वानर सेना विदा लेती है, तो दर्शकों की आंखों में आंसू आ जाते हैं। यह केवल एक नाटकीय दृश्य नहीं, यह कृतज्ञता का पर्व है। जो तुम्हारे संकट में साथ खड़ा रहा, उसे सम्मान सहित विदा करना, यही भारतीय संस्कृति है और यहीं से एक और गहरी बात शुरू होती है शरद पूर्णिमा पूर्णिमा है।

इसके ठीक पंद्रह दिन बाद अमावस्या आती है, जिस दिन भगवान राम अयोध्या लौटते हैं और दीपावली मनाई जाती है। तो यह जो पंद्रह दिन का अंतराल है, यह पक्ष प्रतीक्षा के दिन हैं। शरद पूर्णिमा से दीपावली तक के पंद्रह दिन प्रभु राम की प्रतीक्षा के दिन हैं। अयोध्या में उस समय क्या दृश्य रहा होगा, इसकी कल्पना कीजिए। समाचार आ चुका है कि राम ने विजय प्राप्त कर ली है और वे लौट रहे हैं। पूरे नगर में उत्साह है, पर साथ ही एक अव्यक्त बेचैनी भी है।

हर दिन गिना जा रहा है, हर शाम दीये की बाती ठीक की जा रही है, हर आंगन लीपा जा रहा है। जिन दशरथनंदन राम का राज्याभिषेक होने वाला था उन्हें वनवास मिला था। चौदह वर्षों के बाद अब राम लौट रहे हैं, उनकी अयोध्या वापसी निर्विघ्न हो सकुशल सम्पन्न हो। अयोध्या की प्रतीक्षा चौदह वर्षों के दुखों का समापन है। भारतीय मनीषा कहती है - मिलन से कहीं अधिक आनंद प्रतीक्षा का है, वियोग का है।

मिलन तो एक क्षण है, पर प्रतीक्षा एक साधना है। प्रेम की पराकाष्ठा मिलन में नहीं, प्रतीक्षा में है। दीपावली की जो चमक-दमक हम देखते हैं, जो साफ-सफाई, जो सजावट, जो उत्साह देखते हैं, वह एक दिन में नहीं आता। उसकी तैयारियों का आरंभ शरद पूर्णिमा से ही हो जाता है। शरद की चांदनी में धुला हुआ आंगन ही कार्तिक की अमावस्या में दीयों से जगमगाता है। इसलिए शरद पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं है।

यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है कि हे चन्द्रमा, तुमने हमें शीतलता दी। यह आयुर्वेद का पर्व है कि इस चांदनी में स्वास्थ्य है। यह कृतज्ञता का पर्व है कि जिन्होंने साथ दिया, उन्हें आदर सहित विदा करो। और यह प्रेम का पर्व है कि प्रतीक्षा करना भी एक उत्सव है। इस शरद पूर्णिमा जब आप चांद को देखें, तो केवल एक उपग्रह मत देखिए। उसमें बरसते अमृत को देखिए, उसमें राम की प्रतीक्षा में जागती अयोध्या को देखिए, और उसमें उस विदा लेती वानर सेना की निष्ठा को देखिए, जिसने बिना किसी स्वार्थ के धर्म का साथ दिया। यही शरद पूर्णिमा का असली प्रकाश है।

(लेखिका पद्मश्री से अलंकृत लोकगायिका हैं)

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