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संवत्सरी 2026: जैन धर्म में क्यों खास है यह दिन और क्यों मांगी जाती है हर जीव से माफी?

Published: Tue, 15 Sep 2026 10:04 AM (IST)

संवत्सरी जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण वार्षिक पर्व है, जो पर्युषण के अंतिम दिन मनाया जाता है। यह आत्मशुद्धि, क्षमा-प्रार्थना ...और पढ़ें

जैन धर्म में संवत्सरी पर्व का आध्यात्मिक महत्व

जैन धर्म में संवत्सरी पर्व का आध्यात्मिक महत्व

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। संवत्सरी जैन धर्म का बेहद खास पर्व है, जिसे पर्युषण पर्व के आखिरी दिन मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से श्वेतांबर जैन संप्रदाय द्वारा मनाया जाता है। जैन धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह दिन आध्यात्मिक चिंतन, क्षमा-प्रार्थना और आत्मशुद्धि का होता है।

संवत्सरी का मतलब है 'वार्षिक', यानी साल में एक बार हर जीव से माफी मांगने और माफी देने का सुनहरा दिन है।

साल 2026 में संवत्सरी कब है? 

इस साल संवत्सरी मंगलवार, 15 सितंबर को मनाई जाएगी। पर्युषण के आठ या दस दिनों में जैन धर्मावलंबी तप, व्रत और आत्मविश्लेषण करते हैं। इसका आखिरी दिन संवत्सरी आत्मशुद्धि और क्षमायाचना का दिन होता है। इस दिन जैन धर्म को मानने वाले लोग जीवन में किए गए कर्मों के लिए माफी मांगते हैं।

लोग एक दूसरे से कहते हैं कि,

'मिच्छामी दुक्कड़म्'

अर्थात्- मेरी गलतियों के लिए माफी प्रदान करो।

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संवत्सरी क्यों मनाई जाती है?

संवत्सरी पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांतों 'अहिंसा परमो धर्म, जिओ और जीने दो' के सिद्धांत पर आधारित है। इस दिन को 'क्षमावाणी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। पर्युषण पर्व आठ दिनों का होता है, जिनमें जैन धर्म के अनुयायी व्रत, स्वाध्याय और ध्यान के जरिए से अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं।

यह एक प्रकार से अपने कर्मों का लेखा-जोखा होता है। इस दिन माफी मांगने से मन में बैठा अहंकार, क्रोध, वैर-भाव खत्म हो जाता है।

जैन धर्म के मुताबिक, जब तक आपके मन में किसी के भी प्रति बैर या द्वेष भाव बना रहेगा, तब तक आपको आध्यात्मिक शांति का अनुभव नहीं हो सकता है। 'मिच्छामी दुक्कड़म्' इस बात का प्रतीक है कि, माफ करना और माफी मांगना दोनों आत्मा के उत्थान के लिए काफी मायने रखती है।

संवत्सरी से जुड़ा इतिहास और पौराणिक कथा

संवत्सरी से जुड़ी कथा भगवान महावीर के सिद्धांतों और जैन भिक्षुओं की परंपरा पर आधारित है। पुराने समय में जैन साधु-संत वर्षा ऋतु के 4 महीने (चातुर्मास) में एक ही जगह पर ठहकर तपस्या करते थे, ताकि बारिश में चलने-फिरने से छोटे जीवों की हिंसा से बचा जा सके।

पर्युषण पर्व के दौरान साधु और गृहस्थ दोनों ही गहरी तपस्या और आत्म-चिंतन को महत्व देते हैं। इस दौरान 7 दिनों तक कल्पसूत्र शास्त्र का प्रवचन होता है, जिसमें भगवान महावीर और अन्य तीर्थंकरों के जीवन चरित्र को याद किया जाता है।

आठवें दिन यानी संवत्सरी को तपस्या समाप्त होती है। इस दिन यह माना जाता है कि, भूलकर भी आने वाले साल में किसी जीव को नुकसान न पहुंचाया जाए। जैन धर्म में माफी सिर्फ इंसानों से ही नहीं बल्कि, हवा, पानी, वनस्पति, कीड़े-मकोड़े या किसी भी जीव को कष्ट पहुंचने पर भी माफी मांगी जाती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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