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ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा का क्या है रहस्य? पढ़ें पौराणिक कथा और व्रत का महत्व

Published: Mon, 14 Sep 2026 02:12 PM (IST)

ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को सप्तऋषियों को समर्पित एक त्योहार है, जिसमें महिलाएं आध्यात्मिक शुद्धि और मासिक धर्म संबंधी भूलों के लिए क्षमा मांगने हेतु व्रत रखती हैं।

ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा का महत्व (Picture Credit: AI Generated)

ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा का महत्व (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. ऋषि पंचमी सप्तऋषियों को समर्पित एक महत्वपूर्ण त्योहार है।

  2. महिलाएं मासिक धर्म की अशुद्धियों से मुक्ति हेतु व्रत रखती हैं।

  3. पौराणिक कथाएँ इस व्रत के गहरे आध्यात्मिक महत्व को बताती हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली।  हमारा देश भारत ऋषियों और संतों की भूमि माना जाता है और यहां साधु संतों को भी देवताओं की तरह पूजा जाता है। ऋषि पंचमी का त्योहार ऐसे ही सप्तऋषियों को समर्पित होता है। ऋषि पंचमी हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है।

यह दिन सात ऋषियों के सम्मान और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए मनाया जाता है, जिसमें महिलाओं के लिए व्रत करने का विधान है। इस साल ऋषि पंचमी 15 सितंबर, मंगलवार को मनाई जाएगी।

इस व्रत के दौरान विधि-विधान के साथ पूजनीय ऋषियों का पूजन किया जाता है और पूरे दिन व्रत का पालन करते हुए अगले दिन व्रत खोला जाता है। आइए आपको बताते हैं ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा के कारण, इसके महत्व और इसके पीछे की पौराणिक कथा एक बारे में।

ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा क्यों करते हैं?

ऋषि पंचमी का पर्व वह अवसर होता है जब लोग देवी-देवताओं की पूजा के साथ-साथ ऋषियों के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करने के लिए सप्तऋषियों की पूजा करते हैं। ऋषि पंचमी को गलतियों की मांगने और आभार व्यक्त करने का दिन भी माना जाता है और इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने का विशेष महत्व है।

ऋषि पंचमी के दिन मुख्य सप्तऋषियों-वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज का पूजन किया जाता है और इसकी मान्यता यह है कि यह महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान हुई किसी भी भूल की माफ़ी मांगने का एक तरीका है। इस दौरान सप्तऋषिओं की पूजा से विशेष लाभ होता है और देवताओं के साथ उनकी कृपा भी बनी रहती है।

सप्तऋषियों की पूजा के पीछे की पौराणिक कथा

एक राज्य में एक किसान सुमित्र था और उसकी पत्नी जय श्री थी! जयश्री अत्यंत पतिव्रता नारी थी और एक दिन उसने ऋषियों को भोजन के लिए आमंत्रित किया लेकिन उसी दिन उसे मासिक धर्म शुरू हो गया। वह अत्यंत परेशान हो गई उसने अपनी पड़ोसन की सलाह से सात बार नहा कर सात बार वस्त्र बदल कर भोजन बना दिया।

जब ऋषि भोजन के लिए आए तब उन्हें यह ज्ञात हो गया कि इस भोजन को अशुद्धि से बनाया गया है। ऋषियों में उसे अभिशाप दे दिया कि वो अगले जन्म में बैल और उसकी पत्नी जय श्री ने कुतिया के रूप में जन्म लिया। वे दोनों इसी रूप में उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के यहां रहने लगे। 

अपने माता पिता को दोष मुक्त करने के लिए उसने ऋषियों से पूछा कि किस कारण से यह जीवन मिला है। उस समय ऋषि ने उनकी मुक्ति का उपाय बताया और ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा का विधान बताया। उसने अपनी पत्नी सहित विधि-विधान से ऋषि पंचमी का पूजन व्रत किया फिर व्रत का पुण्य माता-पिता को मिला और वो वापस मनुष्य योनि में आ गए। इस प्रकार आज भी इस व्रत को करता है उसे मासिक धर्म की अशुध्दियों में हुई भूल की क्षमा मिलती है और सप्तऋषियों की कृपा भी मिलती है।

ऋषि पंचंमी व्रत का महत्व

ऋषि पंचंमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा के महत्व के पीछे की पौराणिक कथा ब्रह्मांड पुराण में विस्तार से वर्णित है। इसके अनुसार-

एक बार विदर्भ देश में एक सुमति नम का राजा राज्य करता था जो बहुत ज्यादा धर्मनिष्ठ था और प्रजा के भले के लिए काम करता था। उसकी राज्य में  सुधर्मानामक एक ब्राह्मण रहता था, जिसकी पत्नी का नाम सुषीला और पुत्री का नाम सुमति था। सुमति का विवाह एक योग्य ब्राह्मण से हुआ, लेकिन कुछ ही समय बाद उसके पति की मृत्यु हो गई।

सुमति ने विधवा आश्रम में साध्वी जीवन बिताने लगी और वह धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थी। एक दिन उसे तीव्र शारीरिक पीड़ा होने लगी। तब उसकी माता सुषीला उसे लेकर एक संत के पास पहुंचीं। संत ने ध्यान लगाकर उसकी पीड़ा का कारण जान लिया और बताया कि पूर्व जन्म में सुमति ने रजस्वला के दौरान अज्ञानवश रसोई में कार्य किया था, जिससे उसे शारीरिक अशुद्धता का दोष लगा है जिसका फल उसे इस जन्म में मिल रहा है।

संत ने बताया कि इस दोष से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय ऋषि पंचमी का व्रत करना है। जिसमें सप्तऋषियों की विधिपूर्वक पूजा, व्रत, स्नान और नियम का पालन करने से रजस्वला दोष से मुक्ति मिलती है। यह व्रत मुख्य रूप से महिलाओं के लिए होता है।

सप्तऋषि कौन हैं?

सप्तऋषि वे सात महान ऋषि हैं जो वैदिक ज्ञान, अधिकार और आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक हैं। इन सात ऋषियों के नाम विष्णु पुराण में मिलते हैं, जिसमें ऋषि पराशर ने सात ऋषियों का उल्लेख किया है-

वशिष्ठ-कश्यपो-अत्रि-जमदग्नि-स-गौतमः,

विश्वामित्र-भरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽभवन्।

इसका अर्थ यह है कि- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज सप्तऋषि हैं।

कहा जाता है कि वे आध्यात्मिक प्रकाश की उन सात किरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सृष्टि को बनाए रखती हैं और ब्रह्मांडीय व्यवस्था बनाए रखने में मदद करती हैं।

ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा का विशेष महत्व और इनकी पूजा करने वाली महिलाओं को ऋषियों की कृपा मिलती है और समस्त दोष दूर होते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।