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Raja Parba Festival 2024: कब और क्यों मनाया जाता है ओडिशा का प्रमुख त्योहार रज पर्व?

धार्मिक मान्यता है कि धरती मां की पूजा करने से अन्न और धन की कमी दूर होती है। साथ ही घर में सुख समृद्धि एवं खुशहाली आती है। रज पर्व (Raja Parba Festival 2024) मां धरती को समर्पित होता है। इसमें तीन दिनों तक धरती मां की विशेष पूजा की जाती है। साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

By Pravin KumarEdited By: Pravin KumarSun, 16 Jun 2024 04:22 PM (IST)
Raja Parba Festival 2024: जानें रज पर्व का धार्मिक महत्व

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Raja Parba Festival 2024: हर वर्ष मिथुन संक्रांति के एक दिन पूर्व से लेकर गायत्री जयंती तक ओडिशा में रज पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष 14 जून से लेकर 16 जून तक रज पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व मुख्यतः तीन दिवसीय होता है। वहीं, चौथे दिन को वसुमती स्नान कहा जाता है। इस दिन महिलाएं हल्दी की लेप लगाकर स्नान-ध्यान करती हैं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य के मिथुन राशि में गोचर करने की तिथि से मानसून का आगमन होता है। सूर्य के मिथुन राशि में गोचर करने की तिथि पर रज पर्व भी मनाया जाता है। इसे राजा संक्रांति भी कहा जाता है। राजा संक्रांति के अवसर पर भूमि यानी धरती मां की पूजा की जाती है। आइए, इस पर्व के बारे में सबकुछ जानते हैं-

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क्या है पौराणिक मान्यता ?

सनातन शास्त्रों की मानें तो प्राचीन समय में रज पर्व को कृषि अवकाश कहा जाता था। इसमें जगत के नाथ भगवान विष्णु की धर्मपत्नी धरती मां तीन दिनों तक रजस्वला से गुजरती हैं। इन तीन दिनों में धरती मां की पूजा की जाती है। ओडिशा के नयागढ़ और पूरी समेत कई जगहों पर भगवान विष्णु के साथ भूमि देवी प्रतिमा रूप में अवस्थित हैं। आसान शब्दों में कहें तो भगवान विष्णु और धरती मां की पूजा की जाती है। पूरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के साथ धरती मां की मूर्ति विराजमान हैं।

कब मनाया जाता है रज पर्व ?

रज पर्व या राजा संक्रांति हर वर्ष मिथुन संक्रांति तिथि पर मनाया जाता है। तीन दिवसीय रज पर्व की शुरुआत मिथुन संक्रांति के एक दिन पहले होती है। इस दिन को पहिली राजा कहा जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं स्नान-ध्यान कर धरती मां और बारिश के देवता इंद्र देव की पूजा करती हैं।

वहीं, दूसरे दिन मिथुन संक्रांति मनाई जाती है। इस दिन सूर्य उपासना की जाती है। साथ ही बागों में झूले लगाए जाते हैं। महिलाएं झूला झूलती हैं। साथ ही लोकगीत गाकर नृत्य करती हैं। इस अवसर पर बड़े एवं बच्चे सांस्कृतिक मनोरंजन करते हैं।

राजा संक्रांति के तीसरे दिन भू दाहा मनाया जाता है। इस अवसर पर धरती मां की पूजा की जाती है। साथ ही पूजा में धरती मां को पूरी पकवान अर्पित की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि धरती मां की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि एवं खुशहाली का आगमन होता है। इसके अगले दिन यानी रज पर्व के चौथे दिन वसुमती स्नान किया जाता है।

धार्मिक महत्व 

राजा संक्रांति पर्व का विशेष महत्व है। इस पर्व के अवसर पर तीन दिनों तक भूमि की खुदाई नहीं की जाती है। घर के आसपास के बाग-बगीचे में झूले लगाए जाते हैं। साथ ही घर की साफ-सफाई कर गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। रज पर्व के दौरान महिलाएं स्नान-ध्यान कर सिलबट्टे को भूमि मान कर विधि-विधान से धरती मां की पूजा करती  हैं। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से विवाहित महिलाओं के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।