अयोध्या। पितृ पक्ष में पिंड दान वैदिक परंपरा का अभिन्न अंग है पर विरक्त संतों में इस परंपरा के प्रति गृहस्थों जैसी प्रतिबद्धता नहीं है। उनकी मान्यता है कि घर-बार के साथ उन्होंने पितरों को त्यक्त कर परम पिता से नाता जोड़ लिया है और ऐसे में पितरों के लिए पिंड दान का औचित्य नहीं रह जाता। साथ ही वे अपनी उपासना धारा के पूर्ववर्तियों के लिए पिंड दान की जरूरत नहीं समझते।

परंपरा के मर्मज्ञ पं. राधेश्याम शास्त्री के अनुसार संतों-संन्यासियों का यह विश्वास है कि मृत्यु घटाकाश का महाकाश में मिलन है और जब जीव जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गया तो उसके स्वतंत्र अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। वे पिंडदान एवं श्राद्ध की परंपरा को मां-बाप एवं पितरों के प्रति श्रद्धा से जोड़ते हैं और ऐसे में मां-बाप अथवा अन्य पूर्वजों के जीते-जी दंगम दंगा और मृत्यु के बाद कर्मकांड के नाम पर गंगम-गंगा से बचने की सलाह देते हैं। यद्यपि पिंडदान से विमुख रहने वाले संतों के विपरीत अयोध्या की पौराणिकता पिंड दान की मिसाल से युक्त है। बाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम तब वन में थे, जब उन्हें भरत और विश्वामित्र द्वारा पिता दशरथ की मृत्यु का समाचार मिला और उन्होंने फलों के गूदे से पिंड बना कर श्रद्ध कर्म किया। श्राद्ध कर्म की एक और रोचक नजीर है। महाभारत में वर्णन मिलता है कि भीष्म से पिंड दान लेने के लिए उनके दिवंगत पिता शांतनु का हाथ प्रकट हुआ।

पौराणिक परंपरा में विंबित होने के साथ पिंड दान की महत्ता रामनगरी में रहने वाले बड़ी संख्या में गृहस्थों के घरों और सरयू तट पर श्रद्धालुओं की पांत से अभिव्यक्त होती है। यह श्रद्धालु दूर-दराज से पिंड दान के लिए ही अयोध्या आए होते हैं। पितृ पक्ष के दिनों में खूब व्यस्त रहने वाले शिवकुमार पांडेय कहते हैं कि पिंड दान पितरों के प्रति कृतज्ञता है और हम जिन लोगों से गुजरते हुए पैदा हुए हैं, उनके प्रति आस्था का मौका कैसे गंवाया जा सकता है।

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