गया। श्री शिरडी साईं संध्या मंदिर स्थित द्वारकामाई सभागार से साप्ताहिक प्रवचन करते हुए श्रीसाईं चरणानुरागी भाई डा. कुमार दिलीप सिंह ने कहा कि पितृपक्ष के अंतर्गत मुक्ति तीर्थ गयाजी में पितर भी करते हैं अपने परिजनों की प्रतीक्षा। जल-तर्पण प्राप्त होने से वंचित तथा इस कारण अपने परिजनों का रक्त पीने को बाध्य ये उपेक्षित पितर, क्रोधवश अपने-अपने कुटुंब को शाप दे बैठते हैं।

'श्राद्धं न कुरूते मोहात् तस्यात रक्त पिबंति ते।' फलस्वरूप उनके परिजनों का पारिवारिक वैभव क्षीण होता जाता है और वंश वृद्धि रूक जाती है। गयासुर नामक तपस्वी राक्षस को भगवान द्वारा दिए गए वर के अनुसार यज्ञ हेतु प्रदत्त उसकी छाती पर स्थित श्री विष्णुचरण पर किया गया श्राद्ध कर्म पितरों की मुक्ति हेतु सर्वश्रेष्ठ है। श्राद्ध करने से पितृगण प्रसन्न होकर असीम कृपा बरसाते हैं। श्राद्ध कर्म हमारा परम धर्म है। 'पिंडदान' का एक अर्थ और भी है। इसे समझो। यह शरीर ही पिंड है। इसे ही परमात्मा को अर्पित कर देना पिंडदान है। यदि इस जीवन को इस सोच के साथ किया जाए कि इसे एक दिन ईश्वर को अर्पित होना है तो जीवन भी सार्थक हो जाएगा और पिंडदान भी सच्चा।

श्री गीता स्पष्ट करती है- 'उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मा नमवसादयेत' अर्थात स्वयं ही अपनी आत्मा का संसार-समुद्र से उद्धार करने का यत्‍‌न करो।

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