पापांकुशा एकादशी: काशी-गंगा स्नान से भी बड़ा है इसका पुण्य, सिर्फ एक व्रत से खुल सकते हैं मोक्ष के द्वार
आश्विन मास की पापांकुशा एकादशी 22 अक्टूबर को है, जिसका व्रत करने से कई जन्मों के पाप मिट जाते हैं ...और पढ़ें

पापांकुशा एकादशी व्रत: पापों से मुक्ति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
पापांकुशा एकादशी व्रत 22 अक्टूबर को, पापों से मुक्ति दिलाता है।
यह व्रत मोक्ष का मार्ग खोलता, कई पीढ़ियों का उद्धार।
गंगा-काशी स्नान से भी अधिक पुण्यकारी, दान का विशेष महत्व।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है और इसे पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल पापांकुशा एकादशी का व्रत 22 अक्टूबर, गुरूवार को रखा जाएगा। इस व्रत को इतना पुण्यकारी माना जाता है कि इसे करने वाले के कई जन्मों के पाप मिट जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन सोना, तिल, भूमि, गाय, अन्न, जल, छाता और जूते आदि का दान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने वाला और इस दिन सामर्थ्य अनुसार दान करने वाला व्यक्ति यमराज के लोक में नहीं जाता। आइए इस व्रत के महत्व को विस्तार से जानते हैं।
पापांकुशा एकादशी की पौराणिक कथा
पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा के अनुसार, प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक अत्यंत क्रूर बहेलिया रहता था। उसका पूरा जीवन हिंसा, लूटपाट, मद्यपान और बुरी संगति में बीता। उसने जीवन में अनेक पाप कर्म किए।
जब उसका अंतिम समय निकट आया तो यमराज के दूत उसे लेने पहुंचे। यमदूतों ने बहेलिए से कहा कि अगले दिन उसके जीवन का अंतिम दिन होगा और वे उसे लेने आएंगे।
यह सुनकर बहेलिया बहुत भयभीत हो गया। वह महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगा, "हे ऋषिवर! मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं। कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे सभी पाप नष्ट हो जाएं और मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो।"
बहेलिए की प्रार्थना सुनकर महर्षि अंगिरा ने उसे आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने की सलाह दी। महर्षि के बताए अनुसार बहेलिए ने पापांकुशा एकादशी का व्रत किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उसके सभी संचित पाप नष्ट हो गए और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।
पापांकुशा एकादशी का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार, पापांकुशा एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्य, सुंदर पत्नी तथा अन्न और धन प्रदान करने वाली मानी गई है।
मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत के समान गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर का पुण्य भी नहीं है। हरिवासर में एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करने से मनुष्य सहज ही भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने वाला व्यक्ति मातृ पक्ष की दस पीढ़ियों, पितृ पक्ष की दस पीढ़ियों, स्त्री पक्ष की दस पीढ़ियों और मित्र पक्ष की दस पीढ़ियों का उद्धार करता है। कहा जाता है कि ऐसे व्यक्ति दिव्य शरीर धारण कर, चतुर्भुज रूप में, पीतांबर पहनकर और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को जाते हैं। ऐसी पापांकुशा एकादशी की पौराणिक मान्यता है।
स्रोत: पौराणिक/धार्मिक मान्यताएं एवं उपलब्ध व्रत-कथा सामग्री।
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