विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 22, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

वात्सल्य से आतिथ्य भाव में पहुंची यात्रा

By Edited By:
Published: Fri, 22 Aug 2014 02:46 PM (IST)Updated: Fri, 22 Aug 2014 02:54 PM (IST)

प्रकृति में कोई भाव स्थायी नहीं होता। सुख, दु:ख, उल्लास और उदासी, हर रंग आता है और चला जाता है। ...और पढ़ें

News Article Hero Image

कर्णप्रयाग, [देवेंद्र रावत]। प्रकृति में कोई भाव स्थायी नहीं होता। सुख, दु:ख, उल्लास और उदासी, हर रंग आता है और चला जाता है। परिवर्तन अटल है और इसी का अहसास करा रहा है नंदा पथ। नौटी से ईड़ा बधाणी और फिर राजकुंवरों के गांव कांसुवा तक की यात्रा में उत्साह के साथ उदासी के रंग साफ नजर आए। मां-बाप, भाई-बहन और सखी सहेलियों के लिए नंदा से बिछोह की कल्पना करना भी मुश्किल है। इसीलिए विदाई के वक्त वे विकल हैं। जैसे ही यात्रा कांसुवा से सेम की ओर रवाना होती है तो यह भाव बदलकर उत्साह में परिवर्तित होते जा रहे हैं। अब चिंता है तो सिर्फ बेटी के आतिथ्य की। यानी यात्रा वात्सल्य से आतिथ्य भाव में पहुंच चुकी है।

ससुराल जा रही नंदा की राह में पड़ने वाले गांवों का उत्साह सचमुच अनुपम है। इस दृश्य को शायद ही कोई शब्द चित्र बयां कर पाए। कैलाश की राह पर अग्रसर नंदा अपने मायके क्षेत्र के सभी आत्मीयों से भेंट कर रही हैं। वह इलाके के प्रत्येक गांव में कुछ पल ठहरती है और अपनों से मिलती है। डोली एक गांव से निकलती है तो दूसरे गांव में इंतजार चलता रहता है। बेटी ससुराल जा रही है और उसे खाली हाथ नहीं भेजा जा सकता। आखिर सैकड़ों किमी दूर जा रही नंदा के पास जरूरत का हर सामान होना चाहिए। उनका सुसराल कैलाश तो निर्जन है, वहां सालभर बर्फ रहती है। ऐसे में लोग अपनी सगौड़ी (बगीचा) की साग सब्जी, ककड़ी, तोरी या चचिंडा, जिसके पास जो है उसे बेटी को उपहार स्वरूप भेंट कर रहे हैं। बाजार से कोई महंगा उपहार खरीदने की जरूरत नहीं है। बस जो कुछ वे दे रहे हैं वह स्नेह में भीगा हुआ है। अब रास्ते भर नंदा का आतिथ्य ही हो रहा है। वात्सल्य भाव के इतर अधिकार का भाव भी कम नहीं है। गुरुवार को कांसुवा के पास बिल्वेश्वर मंदिर में पूजा के बाद कोटी गांव के ड्यूंडी ब्राह्मणों ने नौटी गांव के पुरोहितों से राज छंतोली ले जाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली है। दरअसल, गढ़वाल की राजधानी चांदपुरी गढ़ी से देवलगढ़ स्थानांतरित करते वक्त राजा ने राजजात की जिम्मेदारी 14 सयाणों और 12 थोकी ब्राह्मणों को सौंपी थी। कोटी गांव के पुरोहित इन्हीं 12 थोकी ब्राह्मणों में से एक है। जाहिर है राज छंतोली ले जाना उनका अधिकार है। राजजात का एक संदेश यह भी तो है कि जीवन भी पर्वितन की यात्रा है।

आ गई कोटिश प्रार्थना की घड़ी

देहरादून। चार पड़ावों में 40 किलोमीटर की दूरी तय कर राजजात जैसे ही सेम से अपने पांचवें कोटी के लिए प्रस्थान करती है, माहौल रंग बदलने लगता है। और.. कोटी पहुंचते-पहुंचते नंदा पथ उत्साह पथ में तब्दील हो जाता है। धारकोट, घंडियाल और सिमतोली गांवों में पूजा पाने के बाद यात्रा सितोलीधार पहुंचती है। यहां भगोती नंदा की कोटिश प्रार्थना की जाती है, इसीलिए धार के दूसरी तरफ के गांव का नाम कोटी पड़ा।

कोटी समुद्रतल से 1360 मीटर की ऊंचाई पर अवस्थित है और सेम से इसकी दूरी है 10 किलोमीटर। उत्तर-मध्य काल में चांदपुरगढ़, तोप गांव (गढ़) और कोटी में गढ़ सेनाएं रहती थी। आगे बढ़ते हुए जात नंदा देवी मंदिर व मैती पहुंचती है, जहां विशेष पूजा होती है। यहां पर खूबसूरत प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं हैं। लाटू व जीतू बगड्वाल का मंदिर भी गांव में है। यहां से जात कोटी एवं मटियाला पहुंचती है। कोटी में खंडूड़ा, रतूड़ा, चुलाकोट, थापली गांव की छतौलियां एवं बगोली के लाटू देवता भी जात में शामिल होते हैं। बगोली के लाटू देवता व केदारू, चूला, घतौड़ा की छंतौलियां भी इसी स्थल पर यात्रा में शामिल होती हैं। अब सचमुच जात अलकनंदा बनने लगी है, जिसने अपने हृदय में प्रयाग बसा दिए हैं। वर्षो से बंद द्वार-संगाड़ (घरों के दरवाजे) बेटी के स्वागत के लिए खुल गए हैं। इस दौरान लंबी कतारों का हिस्सा बन रहा हर व्यक्ति बेहद उत्साहित नजर आता है और उत्साह पथ में तब्दील हो जाता है नंदा पथ।

श्री नंदा स्वनुल की छंतोली राजजात के लिए रवाना

गोपेश्वर। श्री नंदा देवी राजजात में शामिल होने के लिए जोशीमठ विकासखंड के उर्गम घाटी की श्री नंदा स्वनुल छंतोली भी पूजा-अर्चना के बाद भर्की गांव से रवाना हो गई है। छंतोली बृहस्पतिवार को भेंटा गांव पहुंची। वहां पर ग्रामीणों ने छंतोली की पूजा-अर्चना की। नंदा देवी राजजात में चमोली जिले से भी कई छंतोलियां शामिल होंगी। उर्गम घाटी की स्वनुल देवी की डोली भर्की से भेंटा गांव पहुंची तो यहां के जाख मंदिर में छंतोली की पूजा-अर्चना के बाद नंदा मैती डाली कार्यक्रम के तहत पौधरोपण किया गया। छंतोली के साथ शामिल हुए लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि देवी की छंतोली ग्वाणा, वृद्धबदरी, सलूड़ आदि स्थानों से गुजरते हुए रामणी गांव में अन्य छंतोलियों के साथ मिलेगी।

पढ़े: परंपरा के थाल में संस्कृतियों का संगम

कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति नंदा की जात