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भगवान शिव ने क्यों गले में ही रोक लिया था समुद्र मंथन से निकला विष, पढ़ें कैसे बने 'नीलकंठ'?

Published: Mon, 27 Apr 2026 04:00 PM (IST)

भगवान शिव को 'नीलकंठ' क्यों कहा जाता है? जानें समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष की वह पौराणिक कथा, जिसमें ...और पढ़ें

कैसे शिव जी बने 'नीलकंठ'? (Image Source: AI-Generated)

कैसे शिव जी बने 'नीलकंठ'? (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव के 'नीलकंठ' स्वरूप की महिमा निराली है। यह कथा हमें सिखाती है कि जब संसार पर भारी संकट आता है, तब केवल ईश्वर का त्याग और करुणा ही रक्षा करती है। आइए जानते हैं समुद्र मंथन की वह घटना, जिसने महादेव को नीलकंठ बनाया।

समुद्र मंथन और कालकूट विष का उदय

पौराणिक काल में जब देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के उद्देश्य से समुद्र मंथन शुरू किया, तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सबसे पहले अमृत नहीं, बल्कि कालकूट (हलाहल) नाम का भयानक विष निकलेगा। विष्णु पुराण (प्रथम अंश) और महाभारत के आदि पर्व में इस घटना का विस्तार से वर्णन मिलता है। जैसे ही क्षीर सागर का मंथन शुरू हुआ, उसमें से एक के बाद एक रत्न निकलने लगे। लेकिन, इसी दौरान अचानक समुद्र से एक अत्यंत भयानक विष निकला, जिसे 'हलाहल' या 'कालकूट' कहा गया।

Shiv neelkanth

(Image Source: AI-Generated)

इस विष की ज्वाला और जहरीले धुएं से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। यह इतना शक्तिशाली था कि इसकी एक बूंद पूरी सृष्टि को नष्ट करने के लिए पर्याप्त थी। जब देवता और असुर इस संकट से भयभीत हो गए और उन्हें कोई समाधान नहीं सूझा, तब वे भगवान ब्रह्मा और विष्णु की आज्ञा से महादेव की शरण में पहुंचे।

महादेव का महान त्याग

सृष्टि को बचाने के लिए करुणा के सागर भगवान शिव ने उस विष को पीने का निर्णय लिया। श्रीमद्भागवत पुराण (आठवें स्कंध) के अनुसार, महादेव ने उस भयानक विष का पान कर लिया। महादेव ने जानबूझकर विष को नीचे नहीं उतारा ताकि उनके उदर (पेट) में स्थित पूरे जगत को कोई नुकसार न पहुंचे।

विष इतना प्रभावशाली था कि उसके कारण भगवान शिव का गला नीला पड़ गया। विष का दुष्प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ा। इसी घटना के बाद से भगवान शिव पूरे ब्रह्मांड में 'नीलकंठ' के नाम से विख्यात हुए।

सृष्टि की रक्षा और त्याग का संदेश

विष के शांत होते ही तीनों लोकों में पुनः शांति स्थापित हुई। भगवान शिव द्वारा किया गया यह विषपान उनके असीम त्याग और जगत कल्याण की भावना को दर्शाता है। यह कथा सिखाती है कि महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों की रक्षा करना ही सर्वोच्च धर्म है। शिव जी का नीलकंठ स्वरूप भक्तों को धैर्य और साहस की प्रेरणा देता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।