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स्वयंवर नहीं, यहां हुई थी श्री राम-सीता की पहली मुलाकात; 90% लोग नहीं जानते होंगे रामायण का यह प्रसंग

Published: Wed, 30 Sep 2026 07:30 PM (IST)

प्रभु श्री राम और माता सीता पहली बार कहां मिले थे इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आइए ...और पढ़ें

राम सीता की पहली मुलाकात: स्वयंवर से पहले पुष्पवाटिका का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

राम सीता की पहली मुलाकात: स्वयंवर से पहले पुष्पवाटिका का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. राम और सीता की पहली भेंट पुष्पवाटिका में हुई थी।

  2. माता सीता गौरी पूजा हेतु सखियों संग पुष्पवाटिका गई थीं।

  3. गौरी माता ने सीता को राम वर प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण में न जाने कितने ऐसे प्रसंग हैं जिससे लोग आज भी अनजान हैं। ऐसे ही जब भगवान श्रीराम और माता सीता की बात आती है तो उनसे जुड़ी कई गाथाएं हैं। सीता स्वयंवर से लेकर, वनवास की कहानी। अशोक वाटिका में माता सीता का जीवन और युद्ध समाप्ति के बाद उनकी अग्नि परीक्षा।

ऐसी कई कथाएं  माता सीता की महिमा को उजागर करती हैं और प्रभु श्री राम की गाथा बताती हैं। एक ऐसी ही प्रसंग आता है माता सीता और प्रभु श्री राम की पहली मुलाकात का। आमतौर पर लोगों के मन में सीता स्वयंवर का दृश्य आता है और मन में यही विचार आता है कि वो दोनों पहली बार स्वयंवर में ही मिले थे।

वहीं जब हम रामायण की कथाओं की गहराई तक जाएंगे, तो पता चलता है कि उनकी पहली मुलाकात कहां हुई थी। आइए जानें इसके बारे में विस्तार से।

पुष्पवाटिका में हुई थी राम-सीता की भेंट

रामायण के अनुसार, जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे थे, तब एक दिन माता सीता अपनी सखियों के साथ पुष्पवाटिका में गई थीं।

इसी दौरान श्रीराम और लक्ष्मण भी पुष्प इकठ्ठा करने वहां पहुंचे। इसी पुष्प वाटिका में पहली बार प्रभु श्रीराम और माता सीता ने एक-दूसरे को देखा। यह मुलाकात बेहद संक्षिप्त थी, लेकिन दोनों के मन में एक-दूसरे को जीवनसाथी के रूप में पाने की इच्छा जागृत हो गई। यही नहीं माता सीता ने उस समय माता पार्वती से प्रार्थना भी कि कि उन्हें श्री राम ही वर के रूप में मिलें।

माता सीता क्यों गईं थीं पुष्प वाटिका?

माता सीता पुष्प वाटिका में गौरी मां के पूजन के लिए गईं थीं और वहीं उन्हें प्रभु श्री राम भ्राता लक्ष्मण के साथ दिखे। इस प्रसंग के लिए राम चरितमानस में एक सुंदर चौपाई मिलती है। जिसमें लिखा है कि-

सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥

भावार्थ- तब सीता जी ने सकुचाकर अपने नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने देखा। नख से शिखा तक राम की शोभा देखकर और फिर पिता का प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया।

मन ही मन माता सीता श्री राम को अपने वर के रूप में देखने लगीं और गौरी मां से उन्हें पाने की प्रार्थना की।

माता सीता ने गौरी मां से क्या प्रार्थना की? 

रामचरित मानस के बालकाण्ड में यह दोहा मिलता है जिसमें माता सीता प्रभु श्री राम को वर के रूप में पाने की कामना करती हैं और माता गौरी उन्हें इसका आशीर्वाद देती हैं। वह चौपाई है-

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥"

इस चौपाई का माध्यम से माता गौरी सीता जी को आशीर्वाद देती हैं- 'जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुंदर सांवला वर प्रभु श्री राम तुमको मिलेगा। वह दया का खजाना और सुजान यानी सर्वज्ञ है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है।' इस प्रकार गौरी माता का आशीर्वाद सुनकर जानकी समेत सभी सखियां हर्षित हुईं। तुलसीदास जी कहते हैं - माता भवानी को बार-बार पूजकर सीता जी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं।

रामायण का यह एक ऐसा प्रसंग है जिसके बारे में कई लोग नहीं जानते हैं और वास्तव में माता सीता और प्रभ श्री राम का पुष्प वाटिका में मिलना उनके भविष्य का पहला चरण था।

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