केदारनाथ और पशुपतिनाथ का गहरा नाता: क्यों पशुपतिनाथ के बिना अधूरा माना जाता है केदार बाबा का दर्शन?
क्या आप जानते हैं कि केदारनाथ की यात्रा पशुपतिनाथ के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है? अगर नहीं तो आइए यहां इसकी खास वजह जानते हैं।

अधूरा रहता है केदारनाथ का पुण्य, अगर नहीं किए नेपाल में पशुपतिनाथ के दर्शन! Ai Generated Image

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिमालय की गोद में स्थित केदारनाथ धाम और नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर ये दो ऐसे पवित्र स्थान हैं, जो दो अलग देशों में हैं, लेकिन आध्यात्मिक रूप से एक-दूसरे के प्रतिरूप हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, केदारनाथ का दर्शन तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक भक्त पशुपतिनाथ के दर्शन न किया जाए। इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। आइए यहां पढ़ते हैं।

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पांडवों की खोज कथा
शिवपुराण के अनुसार, इसका संबंध महाभारत काल से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडव अपने भाइयों की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की खोज में हिमालय पहुंचे। शिव पांडवों से नाराज थे और उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने गुप्तकाशी में एक भैंसे का रूप धारण कर लिया और पशुओं के झुंड में छिप गए।
जब भीम ने उन्हें पहचान लिया और पकड़ना चाहा, तो महादेव भूमि में समाहित होने लगे। इस दौरान उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए।
मुख और पीठ का रहस्य
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान शिव भैंसे के रूप में धरती में समाए, तो उनकी 'पीठ' यानी त्रिकोणीय भाग केदारनाथ में ही रह गई, जहां आज ज्योतिर्लिंग के रूप में उनकी पूजा होती है। वहीं, उनके भैंसे रूप का 'मुख' नेपाल के काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज हम पशुपतिनाथ के नाम से पूजते हैं।
यही वजह है कि केदारनाथ और पशुपतिनाथ को एक ही शरीर के दो हिस्से माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'केदारनाथ गत्वा, पशुपतिनाथं न पश्यति, तस्य यात्रा निष्फला भवति,' यानी केदारनाथ जाकर पशुपतिनाथ के दर्शन नहीं किए, तो यात्रा का पूरा फल नहीं मिलता है।
ये हैं पंचकेदार
सिर्फ पशुपतिनाथ ही नहीं, शिव के अन्य अंग उत्तराखंड के इन चार स्थानों पर भी प्रकट हुए, जिन्हें मिलाकर 'पंचकेदार' कहा जाता है।
- मदमहेश्वर - यहां शिव की नाभि प्रकट हुई।
- तुंगनाथ - यहां उनकी भुजाएं प्रकट हुईं।
- रुद्रनाथ - यहां उनका मुख (नीलकंठ) प्रकट हुआ।
- कल्पेश्वर - यहां उनकी जटाएं प्रकट हुईं।
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