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'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया'...नवरात्र के जगराते में आखिर क्यों गूंजता है यह बुंदेली भजन?

Published: Tue, 13 Oct 2026 03:12 PM (IST)Updated: Tue, 13 Oct 2026 03:15 PM (IST)

नवरात्र में 'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया' बुंदेली भजन का विशेष महत्व है, जो जगरातों में गूंजता है। ...और पढ़ें

'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया' भजन का  रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया' भजन का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. 'करे भगत हो आरती' बुंदेली भजन का नवरात्र में महत्व।

  2. यह भजन माता दुर्गा की भक्ति और आराधना का प्रतीक।

  3. बुंदेलखंडी लोकगीत जगरातों में भक्तों को ऊर्जा देता है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र का पर्व आते ही देशभर में माता रानी के जयकारे गूंजने लगते हैं। भक्तों के मन में एक अलग तरह का उल्लास दिखाई देता है और वो माता के जगराते में दिखाई देता है। पूरी रात जागते हुए भक्त ऐसे गीतों की गूंज में सराबोर हो जाते हैं जो उनके तन-मन में एक नई ऊर्जा को जगाते हैं।

ऐसे ही एक भजनों में से है बुंदेलखंड का एक जस 'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया' यह शारदीय नवरात्र में मुख्य रूप से माता दुर्गा को प्रसन्न करने का एक माध्यम माना जाता है जिसके माध्यम से भक्त माता की आरती करते हैं।

अपने शब्दों की खूबसूरती की वजह से यह भक्ति गीत न केवल बुंदेलखंड बल्कि पूरे देश में होने वाले जगरातों का एक अहम् हिस्सा बन गया है। आइए आपको बताते हैं इस गीत के आध्यात्मिक महत्व के बारे में।

बुंदेली भजन 'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया' का अर्थ

बुंदेली भाषा में गाए जाने वाले देवी गीतों की अपनी एक खास पहचान है। इनमें स्थानीय संस्कृति, लोकजीवन और देवी के प्रति अटूट श्रद्धा की झलक देखने को मिलती है। 'करे भगत हो आरती माई दोई बिरिया' भजन की ये पंक्ति भक्तों को माता दुर्गा की आराधना और आरती के भाव से जोड़ती है।

इस पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है - भक्त माता की आरती दोनों बेलाओं यानी सुबह और शाम करते हैं। यहां बेरिया का अर्थ है दोनों बेला या समय।

नवरात्र के जगराता में क्यों गया जाता है यह गीत?

नवरात्र के दौरान इस लोक गीत को जगराते में गाने से ही इस पर्व की पूर्णता मानी जाती है। यह बुंदेली भाषा में गाया जाने वाला एक जस है। जस मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और बुंदेलखंड की लोक संस्कृति में गाये जाने वाली देवी स्तुति को कहा जाता है।

ढोलक, मंजीरे की धुन में जब इस जस को नवरात्र के जागरण में गाया जाता है तो यह सीधे ही माता दुर्गा का आह्वाहन करता है। इस भजन में भक्त माता से प्रार्थना करते हुए बताता है कि वह नियमित बिना चूके हुए माता की आरती करता है और उस अपर माता की कृपा सदैव बनी रहती है।

बुंदेलखंडी जस 'करे भगत हो...का आध्यात्मिक रहस्य

किसी भी लोकभजन की ही तरह ईश्वर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए कठिन शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। यदि भक्त सच्ची भावना और समर्पण से माता दुर्गा की भक्ति में डूबता है तो अनायास ही माता की कृपा प्राप्त होती है।

जगराते में जब भक्त इस भजन को माता के सामने श्रद्धा से गाते हैं तो इसमें भक्त का अपनापन दिखता है जो भक्त और माता को आपस में मिलाता है। यही नहीं माता की इस स्तुति से भक्तों के ऊपर माता दुर्गा का आर्शीवाद भी बना रहता है।

अगर आप भी शारदीय नवरात्र में जगराते का हिस्सा बनने जा रहे हैं तो इस बुंदेली आरती से माता दुर्गा की आराधना जरूर करें।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।