गया। पौराणिक शहर गयाजी में एक पखवारे तक चलने वाले पितृपक्ष मेले की औपचारिक रूप से शुरुआत होने में अब एक दिन शेष रह गया है। पूरी तरह सज-धजकर तैयार गयाजी ‘अपने पुत्रों’ की बाट जोह रहा है। धार्मिक मान्यता के इस कर्मकांड में पौराणिकता तो दिखती है, लेकिन समय के साथ आस्था का यह मेला हाईटेक भी हो गया है। इस नई पद्धति में भी पूरे कर्मकांड को सुलभ बना दिया गया है। हालांकि गयाजी की सैकड़ों वर्ष पुरानी वंशावली अपने पुरातन श्रद्धा को साथ लेकर आज भी जी रही है।

पिंडदान के लिए देश के विभिन्न प्रदेश के लोग यहां आते हैं। आने के पूर्व वे विधि विधान की जानकारी प्राप्त कर लेना चाहते हैं। इसमें उन्हें सहयोग कर रहा है- व्हाट्स एप, ई-मेल, वेबसाइट और मोबाइल फोन। यजमान गया की साइट पर जाकर सारी जानकारी प्राप्त कर ले रहे हैं। इसमें कर्मकांड के बाद तीर्थ पुरोहित को देने वाला ‘दक्षिणा’ का ही जिक्र नहीं है।

दान के पैसे से होता पिंडवेदियों का जीर्णोद्धार


बोधगया की पिंडवेदियां प्रशासनिक उपेक्षा की शिकार है। यहां की पिंडवेदियों का जीर्णोद्धार दानदाताओं के रहमोकरम से कराया जाता है। मातंगवापी व धर्मारण्य पिंडवेदी पर गया शहर के ख्यात व्यवसायी डालमिया परिवार का विशेष ध्यान रहता है। जिसके कारण पितृपक्ष मेला आरंभ होने से पहले साफ-सफाई व रंग-रोगण हो जाता है। इस बार मातंगवापी पिंडवेदी के जीर्णोद्धार व सौन्दर्यीकरण में एक पेट्रोल पंप संचालक ने विशेष ध्यान दिया है। इस वर्ष पितृपक्ष से पूर्व प्रशासन स्तर से दोनों पिंडवेदी तक पहुंच मार्ग में उभरे गढ़े को भरा गया है। और धर्मारण्य पिंडवेदी तक जाने वाले मार्ग का चौड़ीकरण कराया गया है। लेकिन निर्मित मार्ग के दोनों किनारे मिट्टी का भराई नहीं करने से वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की प्रबल संभावना बनी है। दोनों पिंडवेदियों पर पड़ाव स्थल नहीं है। लेकिन प्रशासन द्वारा प्रतिवर्ष पड़ाव शुल्क की वसूली की जाती है।

पर्यटन विभाग कर रहा अधूरा कार्य

राज्य सरकार ने धर्मारण्य पिंडवेदी के विकास का जिम्मा पर्यटन विभाग को सौंप दी। इसके तहत गतेक माह पूर्व धर्मारण्य पिंडवेदी पर चारदिवारी निर्माण, बैठने के लिए चबुतरा का निर्माण और अंदर के पाथ वे का सौन्दर्यीकरण कार्य शुरू हुआ। जो अब तक अधूरा है। यहां शौचालय निर्माण की बात थी। वो नहीं हो सका। बताया गया कि वेदी के आसपास सरकारी जमीन है। जब तक जिला प्रशासन भूमि मुहैया नहीं कराती, शौचालय निर्माण संभव नहीं है।

तृतीया तिथि को पिंडदान का है महत्व

पिंडवेदी के पुरोहित बताते हैं कि धर्मारण्य में महाभारत युद्ध के पश्चात जाने-अनजाने में मारे गए लोगों के आत्मा की शांति के लिए धर्मराज युद्धिष्ठिर ने यहां पिंडदान किया था। तब से पितृपक्ष के तृतीया तिथि को सरस्वती में तर्पण व धर्मारण्य व मातंगवापी में पिंडदान की परंपरा चली आ रही है। तृतीया तिथि 30 सितम्बर को है। इस दिन प्रेतबाधा से मुक्ति के लिए आस्थावान श्रद्धालु यहां त्रिपिंडी श्रद्ध भी करते हैं।

पूर्णतया उपेक्षित है सरस्वती वेदी

सरस्वती वेदी पूर्णतया उपेक्षित है। यहां तक आवागमन के साधन सुलभ नहीं होने के कारण श्रद्धालु नहीं पहुंच पाते हैं। पुरोहित बताते हैं कि सरस्वती वेदी के समीप मुहाने नदी में तर्पण करने का विधान है। लेकिन साधन नहीं होने के कारण श्रद्धालु तर्पण के विधान को धर्मारण्य वेदी के समीप नदी में करते हैं।

बुद्ध के आंगन में होता पिंडदान

प्राचीन मान्यता व समय की बचत के कारण आस्थावान पिंडदानी तीर्थयात्री पिंडदान के विधान को भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान बुद्ध के आंगन अर्थात महाबोधि मंदिर में करते हैं। पिंडदान के लिए महाबोधि मंदिर प्रबंधकारिणी समिति ने मुचलिंद सरोवर के समीप का स्थान सुरक्षित किया है। यहां साफ-सफाई हेतु पितृपक्ष के दौरान अतिरिक्त सफाई कर्मियों की तैनाती होती है। पिंडदान के विधान संपन्न करने के पश्चात भगवान बुद्ध को नमन करते हैं।

Posted By: Preeti jha

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