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क्या हिंदू धर्म में मांसाहार मना है, गीता का त्रिगुण सिद्धांत, देवी भोग और खान-पान का सच क्या है?

Published: Thu, 24 Sep 2026 10:50 AM (IST)

क्या हिंदू परंपरा सिर्फ शाकाहार तक सीमित है? जानिए कैसे श्रीमद्भगवद्गीता और क्षेत्रीय मान्यताओं ने भारत में खान-पान की विविधता को आकार दिया है।

हिंदू धर्म में खान-पान कितना सीमित? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में खान-पान का दायरा केवल शाकाहार तक सीमित है। क्या ये कहना सही होगा? अक्सर यह मान लिया जाता है। लेकिन, असलियत ये है कि इस धर्म से ज्यादा खाने-पीने की विविधता कहीं नहीं हैा। भारत में किस थाली में क्या परोसा जाएगा, यह केवल धर्म से नहीं, बल्कि बहुत हद तक स्थानीय आस्थाओं से तय होता है।

क्षेत्र और परंपरा से बदल जाते हैं थाली के व्यंजन

शाक्त और कश्मीरी परंपरा: बंगाल, असम और ओडिशा की ओर देवी पूजा के दौरान मछली और बलि के प्रसाद को पवित्र भोग माना जाता है। इसी तरह, कश्मीर की कड़कती ठंड और शैव परंपरा के चलते कश्मीरी पंडित महाशिवरात्रि पर मटन का विशेष नैवेद्य चढ़ाते हैं।

वैष्णव परंपरा: राजस्थान, गुजरात और उत्तर भारत के ब्रज क्षेत्र में विष्णु और कृष्ण भक्त कड़ाई से शाकाहार का पालन करते हैं। यहां तक कि प्याज और लहसुन को भी भोजन से दूर रखा जाता है।

दक्षिण के मंदिर: दक्षिण भारत में नारियल, इमली, काली मिर्च और उड़द दाल से तैयार शुद्ध सात्विक प्रसाद की समृद्ध परंपरा रही है।

गीता का त्रिगुण सिद्धांत

श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय में भोजन को शरीर और मन की चेतना से जोड़ते हुए तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ (गीता 17.8)

इसका अर्थ है: उम्र, शुद्धि, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रेम को बढ़ाने वाले, स्वादिष्ट भोजन सात्विक प्रवृत्ति के लोगों को प्रिय होते हैं.

सात्विक: फल, दूध, अनाज और बिना प्याज-लहसुन का आसानी से पचने वाला खाना, आयु बढ़ाता है और मन को शांत रखता है।

राजसिक: अत्यधिक तीखा, मसालेदार और तला-भुना खाना, ऊर्जा देता है लेकिन मन में चंचलता लाता है।

तामसिक: बासी, भारी, नशीले पदार्थ और मांसाहार, जिसे शरीर में आलस्य और जड़ता बढ़ाने वाला माना गया है।

व्रत में सेहत और आस्था का तालमेल

नवरात्र, एकादशी या सावन जैसे शुभ दिनों में अनाज छोड़कर कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना और सेंधा नमक खाने की परंपरा बहुत प्रचलित है। यह नियम केवल धार्मिक त्याग नहीं है, बल्कि यह परंपरा बदलते मौसम में अपने पाचन तंत्र को आराम देने और शरीर को डिटॉक्स करने का एक पारंपरिक तरीका भी है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।