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Ganesh Ji Katha: आखिर किस वजह से कौंच गंधर्व को द्वापर युग में बनना पड़ा भगवान गणेश की सवारी?

सनातन शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान गणेश ने हर युग में अवतार लिया है। सतयुग में भगवान गणेश को विनायक कहा जाता था। सतयुग में भगवान गणेश की सवारी सिंह था। वहीं त्रेता युग में भगवान गणेश को मयूरेश्वर कहा जाता था। जबकि द्वापर युग में देवों के देव महादेव के पुत्र की पूजा गजानन के रूप में होती थी।

By Pravin KumarEdited By: Pravin KumarTue, 14 May 2024 08:14 PM (IST)
Ganesh Ji Katha: इस वजह से कौंच गंधर्व को द्वापर युग में बनना पड़ा भगवान गणेश की सवारी

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Ganesh Ji Katha: सनातन धर्म में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा की जाती है। साथ ही मनोवांछित फल की प्राप्ति हेतु व्रत रखा जाता है। भगवान गणेश को कई नामों से जाना जाता है। सनातन शास्त्रों में उन्हें आदिदेव भी कहा गया है। भगवान गणेश का अवतार हर युग में हुआ है। वर्तमान समय में भगवान गणेश की पूजा रिद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में की जाती है। धार्मिक मान्यताएं हैं कि भगवान गणेश की पूजा करने से सुख, सौभाग्य और आय में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में व्याप्त समस्त प्रकार के संताप दूर हो जाते हैं। अतः साधक हर बुधवार को भगवान गणेश की पूजा करते हैं। वहीं, शुभ कार्य करने से पहले श्रीगणेश की पूजा करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि किस वजह से कौंच गंधर्व को द्वापर युग में भगवान गणेश की सवारी बनना पड़ा ? आइए, इससे जुड़ी कथा जानते हैं -

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भगवान गणेश का स्वरूप

सनातन शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान गणेश ने हर युग में अवतार लिया है। सतयुग में भगवान गणेश को विनायक कहा जाता था। सतयुग में भगवान गणेश की सवारी सिंह था। वहीं, त्रेता युग में भगवान गणेश को मयूरेश्वर कहा जाता था। जबकि, द्वापर युग में देवों के देव महादेव के पुत्र की पूजा गजानन के रूप में होती थी। द्वापर युग में अवतरित भगवान गणेश की सवारी मूषक है और गणेश जी चार भुजाधारी हैं। कलयुग में भगवान गणेश को धूम्रवर्ण कहा जाता है। इस युग में भगवान गणेश की सवारी नीला घोड़ा है। कलयुग में भगवान गणेश दो भुजाधारी हैं। भगवान गणेश आदिदेव के रूप में जाने जाते हैं। अनंत काल से भगवान गणेश की पूजा की जाती है। शास्त्रों में भगवान गणेश को प्रणव कहकर संबोधित किया गया है।

कथा

चिरकाल में सुमेरु पर्वत पर सौभरि ऋषि अपनी अर्द्धांगिनी मनोमयी के साथ रहते थे। सौभरि ऋषि महान तपस्वी थे। उनके पुण्य-प्रताप और तपोबल का डंका तीनो लोक में बजता था। उनकी धर्मपत्नी मनोमयी बेहद रूपवान थीं। एक दिन सौभरि ऋषि किसी कार्य विशेष हेतु वन गए थे। ऐसा कहा जाता है कि सौभरि ऋषि लकड़ी एकत्र करने वन गए थे। उसी समय कौंच गंधर्व जो मनोमयी पर मोहित था, सौभरि ऋषि के आश्रम आ पहुंचा। कौंच नामक गंधर्व के मन में मनोमयी के साथ प्रणय करने की इच्छा जागृत हो उठी थी।

अतः वह बिना किसी डर के मनोमयी के हाथ को पकड़ लिया। यह देख मनोमयी घबरा गईं और कौंच से ऐसा किसी कुकृत्य न करने की सलाह दी। जब कौंच नहीं माना तो मनोमयी ने दया की याचना की। इसके बावजूद कौंच नहीं माना। उस समय मनोमयी ने जगत के पालनहार भगवान विष्णु की आराधना की। तत्क्षण सौभरि ऋषि आश्रम आ पहुंचे। कौंच गंधर्व को देख क्रोधित हो उठे।

उन्होंने गुस्से में कौंच को श्राप दिया कि चोर की भांति तुमने मेरी भार्या का हाथ पकड़ा है। इसके लिए तुम मूषक बन जाएगा और चोर की भांति चोरी कर अपना पेट भरेगा। सौभरि ऋषि के श्राप से कौंच घबरा गया। उस समय कौंच ने सौभरि ऋषि से क्षमा याचना की। तब सौभरि ऋषि ने कहा कि श्राप वापस नहीं हो सकता है, लेकिन जब द्वापर युग में भगवान गणेश का जन्म होगा। उस समय तुम उनकी सवारी बनोगे। भगवान गणेश की सवारी बनने के चलते तुम्हें खोया हुआ सम्मान वापस मिलेगा।

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