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रावण के 10 शीश के पीछे छिपा है गहरा आध्यात्मिक संदेश! काम, क्रोध और अहंकार से जुड़ा है रहस्य

Published: Mon, 19 Oct 2026 06:00 PM (IST)

दशहरा पर रावण के दस सिरों का गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है। ...और पढ़ें

रावण के दस सिर का रहस्य, जानें गहरा आध्यात्मिक संदेश (Picture Credit: AI Generated)

रावण के दस सिर का रहस्य, जानें गहरा आध्यात्मिक संदेश (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. रावण के दस सिर ज्ञान और दस बुराइयों के प्रतीक।

  2. काम, क्रोध, मोह, अहंकार जैसे अवगुणों का द्योतक।

  3. रावण दहन से आंतरिक बुराइयों का होता है नाश।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल, दशहरा का पर्व पूरे देश में घूमधाम से मनाया जाता है और इसे श्री राम के रावण पर विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और अंधकार पर प्रकाश की जीत के पर्व के रूप में मनाया जाता है।

दशहरा पर्व आते ही रावण के दस सिर वाली प्रतिमा अहंकार में अट्टहास करती हुई दिखाई देती है। यही नहीं रावण दहन की परंपरा भी सदियों से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती चली आ रही है। ऐसे में कई बार मन में एक सवाल यह आता है कि आखिर क्यों रावण को हमेशा दस सिर वाला ही दिखाया जाता है? आखिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से आज भी रावण का दहन उसके 10 सिरों के साथ ही किया जाता है।

दरअसल इसके कई आध्यात्मिक अर्थ हैं और हर शीश का अपना एक अलग मतलब और महत्व है। आइए आपको बताते हैं इसके बारे में यहां विस्तार से।

रावण के 10 शीश किसका प्रतीक होते हैं?

रावण ने अपने पूरे जीवन में न केवल नकारात्मक, बल्कि सकारात्मक गुण भी दिखाए । वह एक कुशल योद्धा, राजनीतिज्ञ और राजा होने के साथ-साथ वह एक ज्योतिषी और आयुर्वेद चिकित्सक भी था। एक राजा के रूप में वह अपनी प्रजा का विशेष ध्यान भी रखता था और उसी वजह से लंका में रावण का हमेशा से ही डंका था।

वह एक असाधारण कवि और विद्वान भी था। उसके 10 सिरों को 6 शास्त्रों और 4 वेदों का प्रतीक माना जाता है। हलांकि, जब लंकापति रावण जीवन में कई बुराइयों में फंस गया और एक उसके यही गुण कुछ बुराइयों में बदल गए। जिसके कारण से आज के समय में लंकापति के 10 शीश वाला पुतला उन 10 बुराइयों के दहन को दिखाता है।

रावण के पुतले के साथ किन बुराइयों का दहन किया जाता है?

जब रावण को सत्ता का घमंड और अपनी बुद्धिमता पर अभिमान होने लगा तब उसके 10 शीश ज्ञान के ना होकर कुछ अवगुणों को दिखाने लगे जिन्हें आज भी उसके पुतले के साथ जलाया जाता है।

ये 10 बुराइयां काम यानी वासना, क्रोध यानी गुस्सा, मोह, लोभ, मद, ईर्ष्या, बुद्धि, मन, चित्त, अहंकार का प्रतीक होती हैं। भगवद गीता के अनुसार, आध्यात्मिक जीवन में सफलता के लिए व्यक्ति के भीतर इन सभी गुणों को वश में करने की क्षमता जरूर होनी चाहिए जिससे उसे किसी प्रकार की समस्याओं का सामना न करना पड़े।

रावण को कैसे मिला था 10 शीश का वरदान?

रामायण के अनुसार, रावण को दस सिर वाला शक्तिशाली लंकापति कहा जाता है। इसी कारण से उसे दशानन भी कहा जाता है। रावण असाधारण विद्वान था और उसकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने 10 शीश का वरदान दिया था जो वेद और शास्त्रों का प्रतीक थे।

यही नहीं भगवान शिव ने भी रावण को 10 शीश का वरदान दिया था, इसके पीछे एक कथा प्रचलित है। एक बार रावण भगवान शिव की आराधना कर रहा था और जब वो प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए एक-एक करके अपने सिर काटने शुरू कर दिए। जैसे ही रावण के एक शीश कट जाता था उसका दूसरा सिर निकल आता था, इस प्रकार 10 शीश काटने के बाद शिव जी प्रसन्न हुए और उसे 10 शीश का वरदान दिया।

इस प्रकार आज भी जब 10 शीश वाले रावण का दहन होता है, वो यह दिखाता है कि उसके साथ व्यक्ति को अपनी बुराइयों का भी दहन करना चाहिए।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।