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भोग लगाने के बाद क्यों बदल जाता है भोजन का स्वाद? इसके पीछे छिपी है अदृश्य शक्ति

Published: Wed, 26 Aug 2026 10:07 AM (IST)

श्रीमद्भगवद्गीता और शास्त्रों के अनुसार जानिए ईश्वर नैवेद्य को सूक्ष्म रूप से कैसे स्वीकार करते हैं।

क्या ईश्वर वाकई इसे ग्रहण करते हैं? (AI-Generated Image)

क्या ईश्वर वाकई इसे ग्रहण करते हैं? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पूजा-पाठ के दौरान भगवान के सामने फल, मिठाई या सात्विक भोजन अर्पित करना हमारी सनातन परंपरा का एक अहम हिस्सा है। लेकिन, अक्सर कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब चढ़ाया गया भोग थाली में वैसा का वैसा ही रखा रहता है, तो फिर क्या ईश्वर वाकई इसे ग्रहण करते हैं? चलिए ज्योतिषी से जानते हैं कि इसके पीछे क्या रहस्य और लिज्ञान छिपा है।

एस्ट्रोपत्री के श्री चंद्रेश शर्मा के अनुसार, शास्त्रों (जैसे श्रीमद्भगवद्गीता) में बताया गया है कि भगवान भौतिक रूप से भोजन नहीं खाते, बल्कि वे भक्त की 'भावना' और 'सूक्ष्म सुगंध व रस' को ग्रहण करते हैं

भाव और सूक्ष्म ऊर्जा का सिद्धांत

श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय के 26वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

इसका अर्थ है कि अगर कोई भक्त प्रेम और निष्ठा से एक पत्ता, फूल, फल या केवल जल भी अर्पित करता है, तो ईश्वर उसे खुशी से स्वीकार करते हैं। यहां मुख्य बात 'भक्ति' और 'भाव' है। ईश्वर भोजन के स्थूल रूप (जो भौतिक रूप से दिखता है) को नहीं खाते, बल्कि उसके पीछे छिपी भक्त की भावना, उस भोजन की सूक्ष्म सुगंध और उसके रस को ग्रहण करते हैं।

सूर्य की किरणों से समझिए यह विज्ञान

इसे समझने के लिए शास्त्रों में एक व्यावहारिक उदाहरण दिया गया है। जैसे तेज धूप में सूर्य की किरणें तालाब या समुद्र के जल से नमी खींच लेती हैं, लेकिन जल का भौतिक अस्तित्व वहीं बना रहता है। ठीक उसी तरह, जब हम पूर्ण निष्ठा से प्रभु को नैवेद्य अर्पित करते हैं, तो ईश्वर अपनी दिव्य चेतना से उस भोजन की सूक्ष्म ऊर्जा को स्वीकार कर लेते हैं।  

साधारण भोजन कैसे बनता है 'प्रसाद'?

जब भगवान किसी भोजन को सूक्ष्म रूप से स्वीकार कर लेते हैं, तो वह सामान्य आहार न रहकर 'प्रसाद' का रूप ले लेता है।
ईश्वरीय स्पर्श के बाद वह भोजन सकारात्मक तरंगों से भर जाता है, जिससे मन के विचार शुद्ध होते हैं।
ऐसा प्रसाद ग्रहण करने से शरीर को आरोग्य और आत्मा को शांति मिलती है।

इसलिए, अगली बार जब आप भगवान के आगे भोग की थाली रखें, तो उसमें केवल पकवान नहीं, बल्कि अपना प्रेम-भाव भी शामिल करें। भगवान भोजन के भूखे नहीं, केवल आपके सच्चे भाव के भूखे हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।