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भगवान विष्णु का योगनिद्रा में जाना ही नहीं, ये भी है चातुर्मास में यात्राएं रोकने का बड़ा कारण

Published: Fri, 28 Aug 2026 12:58 PM (IST)

सावन से कार्तिक तक चलने वाले चातुर्मास में साधु-संत और आम लोग तीर्थ यात्रा क्यों नहीं करते थे? जानिए इसके धार्मिक नियम, मौसम और स्वास्थ्य से जुड़े असली कारण।

चातुर्मास से जुड़े नियम (AI-Generated Image)

चातुर्मास से जुड़े नियम (AI-Generated Image)

HighLights

  1. चातुर्मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं

  2. खराब सड़कें और कीट-पतंगे यात्रा रोकने का बड़ा कारण है

  3. इस दौरान पाचन तंत्र कमजोर होने से यात्रा से बचते थे

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन से लेकर कार्तिक तक का समय हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है। इन्हीं चार महीनों को 'चातुर्मास' कहते हैं। आज के समय में सावन, जन्माष्टमी या गणेश उत्सव के मौके पर लोग भारी संख्या में तीर्थ यात्राओं पर निकलते हैं। लेकिन, कुछ दशक पहले तक तस्वीर बिल्कुल इससे अलग थी।

पहले के समय में साधु-संत हों या आम लोग, चातुर्मास में लंबी तीर्थ यात्राएं करने से बचते थे। आखिर इन चार महीनों में यात्रा रोकने की यह परंपरा क्यों बनी? आइए इस आर्टिकल में समझते हैं कि चातुर्मास क्या है और इसके नियम क्या हैं।

चातुर्मास क्या है?

चातुर्मास आषाढ़ महीने की देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक महीने की देवउठनी एकादशी तक चलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा यानी विश्राम की अवस्था में रहते हैं। इसलिए, इस दौरान शादी-ब्याह या गृह प्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। इसकी जगह पूजा-पाठ, व्रत और आत्मचिंतन पर ज्यादा फोकस किया जाता है।

एक ही जगह साधु-संत क्यों रुक जाते थे?

सनातन परंपरा में साधु-संत साल भर घूम-घूम कर लोगों तक धर्म का संदेश पहुंचाते थे। लेकिन, जैसे ही चातुर्मास का समय आता था वे किसी एक मंदिर, आश्रम या गांव में रुक जाते थे। इसे 'वर्षावास' भी कहा जाता है। उनका मानना था कि लगातार भटकने की बजाय, एक जगह रुककर ध्यान और साधना करने से मन को एकाग्रता मिलती है और आध्यात्मिक तरक्की भी होती है।

आम लोगों के लिए यात्रा रोकने की व्यावहारिक वजहें

इसके पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि बहुत ही व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण भी छिपे थे:

  • पहले के जमाने में पक्की सड़कें और गाड़ियां नहीं हुआ करती थीं। चातुर्मास पूरी तरह से बारिश का मौसम होता है। ऐसे में उफनती नदियां, कीचड़ और घने जंगलों के बीच से पैदल यात्रा करना जोखिम भरा होता था।
  • बारिश के दौरान जमीन पर छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाते हैं। इससे पैदल चलने में उनपर पैर पड़ने का डर बना रहता था। ऐसे में साधु-संत और आम लोग भी यात्राएं रोक देते थे। यह प्रकृति के प्रति हमारी संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।
  • आयुर्वेद के अनुसार, बारिश के मौसम में हमारा पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। ऐसे में बाहर का पानी और खाना बीमारियों का कारण बन सकता था। इसलिए घर पर रहकर सादा और संयमित भोजन करने की सलाह दी जाती थी।

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्नमाध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।