वाराणसी काशीपुराधिपति ने गौना महोत्सव (रंगभरी एकादशी) पर भक्तों को होली का नेग दिया और दूसरे दिन खुद इस रंग में रंगे। इसमें अपना अंदाज दिखाया। तिरस्कृतों को अपनाने, दुनिया का गरल सहज गटक जाने का संदेश देते हुए उन्होंने चिता भस्म और भभूत-गुलाल से गणों के साथ होली मनाया। इसमें बाबा का भक्त मंडल तो था ही अदृश्य रूप देव-दानव, भूत-पिशाच और प्रेत दल भी खिंचा चला आया।

बाबा के माथे पर चिता भस्म सजाया और गंगा तट हर हर महादेव के उद्घोष के बीच राग विराग के दोनों रंगों से एक साथ नहाया। राग विराग की इस साझा होली में डोमराज शिव स्वरूप तो बाबा के भक्तजनों की टोली गण रूप में थी। माना जाता है कि भगवान शंकर ने श्मशानघाट पर सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की डोमराजा के रूप में परीक्षा ली थी, इसलिए उन्हें शिव का प्रतीक माना जाता है। यह भी मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ महाश्मशान में वास कर तारक मंत्र देते हैं। इस उपलक्ष्य में ही रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन राग रंग बाबा के विराग अंग को उत्सवी सम्मान देते हैं। इस मौके पर मणिकर्णिका घाट स्थित मंदिर में महाश्मशाननाथ का शृंगार, आरती, पूजा-अर्चना और डमरू की थाप व घंटा घडिय़ाल की टनकार के बीच सुरों से आराधना भी की गई।

Posted By: Preeti jha

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