कृष्ण ने लिया अवतार 

भाद्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण नाम से मथुरा में अवतार लिया था। भगवान स्वयं इस दिन अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा की निशीथ समय होती है जो, वैदिक समय गणना के अनुसार मध्यरात्रि का समय होता है। इसी समय भक्त बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। जो लोग इस दिन व्रत करते हैं वे प्रातःकाल पूजा करके केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण करते हैं। कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रातःकाल लिया जाता है और संकल्प के साथ ही व्रत प्रारम्भ हो जाता है।

जन्माष्टमी पूजन का शुभ मुहूर्त 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयन्ती और श्री जयन्ती के नाम से भी जाना जाता है। इस बार भगवान श्रीकृष्ण का 5245वां जन्मोत्सव मनाया जायेगा। इसके पूजन का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है। 2 सितंबर 2018 को शाम सप्तमी तिथि 08.48 तक रहेगी फिर अष्टमी तिथि कृतिका नक्षत्र में प्रारंभ होगी जिसके बाद पवित्र रोहणी नक्षत्र का व्याधात योग में ४.२६ हर्षण योग में आरंभ होगा। इसी मुहूर्त में ठीक 12 बजे भगवान कृष्ण का जन्म किया जायेगा। निशित पूजा मुहूर्त- 11:58 से 12:44 बजे तक रहेगा। व्रती 11:58 से ही जन्म की समस्त तैयारी कर लें क्योंकि कृष्ण जन्म का सर्वोत्तम समय 12:00 बजे ही होता है। 

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत में इन बातों का रखें विशेष ध्यान 

एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी उपवास के दौरान भी पालन किये जाते हैं। जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये। ये व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी का पारण समय कहते हैं। जन्माष्टमी का पारण अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाता है। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है। अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से किसी के भी सूर्यास्त तक समाप्त ना होने पर जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ना चाहिए। इस तरह अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत दो दिनों तक भी हो सकता है। कुछ धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो लोग लगातार दो दिनों तक व्रत करने में सक्षम नहीं है, वो अगले दिन सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं।

Posted By: Molly Seth