एकादशी पर करें 'अच्युताष्टकम' का पाठ, श्रीहरि की कृपा से जीवन के सारे कष्ट होंगे दूर
एकादशी के शुभ अवसर पर अच्युताष्टकम का पाठ करना बहुत कल्याणकारी माना जाता है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित इस स्तोत्र से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।

'अच्युताष्टकम' का पाठ (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। एकादशी का दिन भगवान विष्णु की आराधना के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और प्रभु का नाम जपते हैं ताकि उनका जीवन सुखद बना रहे। 'अच्युताष्टकम' एक ऐसा प्रभावशाली और मधुर स्तोत्र है, जिसके शब्द भगवान अच्युत (जिनका कभी विनाश न हो - श्री कृष्ण/विष्णु) की महिमा का गुणगान करते हैं।
मान्यता है कि एकादशी की पूजा के दौरान इसका पाठ करने से साधक के मन को अपार शांति मिलती है और उसे श्रीहरि का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मोहिनी एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि का प्रारंभ: यह पावन तिथि 26 अप्रैल 2026 को शाम 06:06 बजे शुरू होगी।
एकादशी तिथि का समापन: तिथि का अंत अगले दिन यानी 27 अप्रैल 2026 को शाम 06:15 बजे होगा।
व्रत की तारीख: उदया तिथि की गणना के अनुसार, मोहिनी एकादशी का व्रत 27 अप्रैल 2026, सोमवार के दिन रखा जाएगा।

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अच्युतस्याष्टकम्
अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे ॥
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥
विष्णवे जिष्णवे शाङ्खिने चक्रिणे
रुक्मिणिरागिणे जानकीजानये ।
बल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने
कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो
दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः ।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरौः सेवितोऽगस्तसम्पूजितो
राघव पातु माम् ॥
धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्द्वेषिहा
केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः ।
पूतनाकोपकःसूरजाखेलनो
बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ॥
विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं
प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् ।
वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं
लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं
रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः ।
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं
किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं
प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् ।
वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भरस्तस्य
वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥
भगवान विष्णु के मंत्र
1. शांताकारम भुजङ्गशयनम पद्मनाभं सुरेशम।
विश्वाधारं गगनसद्र्श्यं मेघवर्णम शुभांगम।
लक्ष्मी कान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्यान नग्म्य्म।
वन्दे विष्णुम भवभयहरं सर्व लोकेकनाथम।
ॐ नमोः नारायणाय नमः। ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः।
2. ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।
ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।
3. दन्ताभये चक्र दरो दधानं,
कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया
लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।
4. यं ब्रह्मा वरुणैन्द्रु रुद्रमरुत: स्तुन्वानि दिव्यै स्तवैवेदे:।
सांग पदक्रमोपनिषदै गार्यन्ति यं सामगा:।
ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यति यं योगिनो
यस्यातं न विदु:सुरासुरगणा दैवाय तस्मै नम:।।
5. ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान।
यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्टं च लभ्यते।।
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