श्राद्ध के पांचवे दिवस है में इस तिथि को ब्रह्म सरोवर तीर्थ में तर्पण-पिंडदान के बाद ब्रह्मा जी के यज्ञयूप की प्रदक्षिणा एवं पितृमुक्ति हेतु समीप में स्थित काकबलि वेदी पर काले उरद की बलि होती है।

ब्रह्म सरोवर में ब्रह्मा जी ने यज्ञ के अंत में अवमृथ स्नान किया था। स्नान के बाद यज्ञ काष्ठ को यज्ञयूप के रूप में स्थापित करना यज्ञ की एक विधि है। उसकी प्रदक्षिणा से श्राद्ध कर्ता को अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। साथ ही एक आम्रवृक्ष उत्पन्न हुआ था। समीप में पश्चिम उत्तर कोण पर इसका वृक्षारोपण ब्रह्मा ने किया। वृक्ष की जड़ में कुशा के सहारे जलाधारा देने से पितर मुक्त हो जाते हैं। इसके बाद पितृतारक ब्रह्मा का दर्शन किया जाता है। ब्रह्मा की मूर्ति पुष्कर तीर्थ के अलावा एक मात्र गया तीर्थ में है। इनको तारक ब्रह्म कहा जाता है। इनके दर्शन नमस्कार से पितर तर जाते हैं।

गया धाम में यज्ञ करने की बेला में अपने शरीर से ब्रह्मा ने उक्त ब्रह्म मूर्ति को उत्पन्न किया था। गय असुर के सिर भाग का परिमाण ब्रह्म सरोवर से ही प्रारंभ होता है। इसका सिर ब्रह्म सरोवर से उत्तर मानस तक दक्षिण-उत्तर में व्याप्त है। नागकूट पर्वत (सीता कुंड) से मंगलागौरी (भष्मकुट पर्वत) तक इसका सिर भाग पूर्व-पश्चिम में व्याप्त है। गय असुर के सिर का भाग को फल्गु तीर्थ भी कहते हैं। फल्गु तीर्थ क्षेत्र में गया श्राद्ध की सर्वाधिक वेदियां हैं।

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