यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 22, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
स्कंद पुराण के कुमारीखंड में भी मिलता है करवा चौथ व्रत का वर्णन
पुराणों के अनुसार देवी अनुसुईया के द्वारा चलाई गई कर्क चौथ व्रत की परंपरा आज के समय में करवा चौथ ...और पढ़ें

हरिद्वार। पुराणों के अनुसार देवी अनुसुईया के द्वारा चलाई गई कर्क चौथ व्रत की परंपरा आज के समय में करवा चौथ व्रत परंपरा बन गई है। तब देवी अनुसुईया ने सुंदर और सुशील पति की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखा था। आज यह सुहागिनों के प्रमुख व्रत के रूप में जाना जाता है।
ज्योतिषाचार्या दीप्ति शर्मा श्रीकुंज ने बताया कि करवा चौथ का पौराणिक महत्व है। स्कंद पुराण के कुमारिका खंड में इस व्रत का उल्लेख मिलता है। उस समय इस व्रत को कर्क व्रत के रूप में जाना गया। लेकिन, कालांतर में इसका नाम करवा चौथ व्रत पड़ गया है। वहीं इस बार इस व्रत पर बहुत ही शुभ संयोग बन रहे हैं। इस बार पूरे सत्तर सालों बाद यह करवा चौथ रोहिणी नक्षत्र में आ रहा है। इसलिए, इस व्रत को सुहागिनों के लिए अति शुभ बताया जा रहा है। मान्यता है कि रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा को अति प्रिय है। रोहिणी नक्षत्र को प्रीति नक्षत्र भी कहा जाता है। चंद्र दर्शन करने के बाद ही सुहागिनें अपने पति का मुख देखकर इस व्रत का पारण करती हैं।
शाम आठ बजकर 16 मिनट पर होंगे चंद्र दर्शन-
करवा चौथ को सुहागिनों को शाम आठ बजकर 16 मिनट पर चंद्रमा के दर्शन होंगे। इसलिए वे इस समय चंद्र दर्शन कर व्रत का पारण कर सकती हैं।
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