गया। विष्णुपद मंदिर के पूर्वी दिशा में सीताकुंड स्थित है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम और माता जानकी ने राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। इस कारण से उस स्थल का नाम सीताकुंड रखा गया है।

रविवार को फल्गु नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण सीताकुंड पहुंचने का मार्ग कठिन हो गया है। सीताकुंड तक पहुंचने के लिए पिंडदानियों ने घरनाई का सहारा लिया। नदी में स्थानीय लोगों ने घरनाई की व्यवस्था की। इस नाव पर एक साथ 10 से 12 लोगों को नदी पार कराया जाता है।

घरनाई में बैठने से पहले पिंडदानी काफी सहमे रहते हैं। प्रभु और पूर्वजों की याद कर घरनाई की यात्रा की। कारण उस नाव पर बगल से पकड़ने की कोई व्यवस्था नहीं है। उस पर सवारी करने वाले पिंडदानी घरनाई पर बैठकर यात्रा करते हैं।

गयाधाम में है विष्णु का पाद

आश्रि्वन कृष्ण षष्ठी शनिवार 14 सितम्बर को 17 दिवसीय गया श्राद्ध का सप्तम दिवस है। इस तिथि को सोलह वेदी तीर्थ के कार्तिकेय पद, दक्षिणाग्नि पद, गार्हयत्याग्नि पद, आहवनीयाग्नि पद एवं सूर्य पद पर श्राद्ध होता है। श्राद्ध के बाद विष्णु चरण पर पिंड अर्पित किए जाते हैं। बद्रीनाथ में विष्णु का सिर कपाल है। अत: बदरी नारायण तीर्थ को कपाल गया कहते हैं। गयाधाम में विष्णु का पाद है। अत: इसे पाद गया कहते हैं। पाद गया श्राद्ध के बाद कपाल गया में श्राद्ध का विधान है। किन्तु कपाल गया में श्राद्ध के बाद पाद गया में श्राद्ध का विधान नहीं है। कपाल गया करने के बाद गया में ब्राह्मण भोजन रूपी श्राद्ध अथवा आमान्न (कच्चा अन्न) दान रूपी श्राद्ध किया जाता है। विष्णु चरण का दर्शन, स्पर्श एवं नमस्कार पितरों का उद्धार करता है। विष्णु चरण में भगवान के आयुध समाहित है- वज्र, अंकुश, ध्वज, धनुष, वाण, शंख, चक्र, गदा एवं पद्म। साथ ही भगवान के पार्षद भी चरण में सन्निहित है- चन्द्रमा, तुलसी वृक्ष, कच्छप एवं मीन।

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