समुद्र तट मिली मूर्तियों को स्थापित कर बनाया मंदिर 

दक्षिण में त्रिप्रायर नदी के किनारे दक्षिण पश्चिमी शहर त्रिप्रायर में श्री राम का ये भव्य मंदिर निर्मित है। इस मंदिर के बारे में प्रसिद्घ है की यहां स्थापित मूर्ति  इस स्थान के मुखिया को समुद्र तट पर मिली थी। पुराणो के अनुसार भगवान विष्णु के सांतवें अवतार श्री राम की ये मूर्ती लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की मूर्तियों के साथ त्रिपायर के समुद्र के किनारे अपने आप आ पहुंची थीं। जहां से वक्केल कोविलाकम नाम का उस स्थान का प्रमुख उन्हें ले आया आैर उनको त्रिप्रायर, तिरुमूज़िक्कलम, कूडलमाणिक्कम और पैम्मेल नाम के स्थानों पर विधि विधान से प्रतिष्ठित कर दिया गया। कालांतर में वक्केल के वंशज दक्षिण में आैर आगे की ओर चले गए और त्रिकपालेश्वर के भक्त बन गये।  वे भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने वाले निराणं नाम के स्थान पर रहने वाले तुडन्गयिल के रूप में भी प्रसिद्घ हुए आैर तालवाड़ी या चेरूस्सेरी गांव में बस गए। एक अन्य संबंधि तच्चुडाय कोविलाकम, इरिनजालाकुडा में निवास करने लगा आैर वहां राम पूजा की परंपरा शुरू की। कहते हैं कि एक ही दिन में इन सभी चार स्थानों पर पूजा करना विशेष रूप से शुभकारी होता है।

मूर्ति का अनोखा स्वरूप  

यहां मूर्ति का रूप बहुत ही अलग है जिसमें चतुर भुजा धारी विष्णु को राम बन कर दानव काड़ा पर विजेता के रूप में दिखाया गया है। एेसी भी मान्यता है कि ब्रह्मा और शिवजी के अंश भी इस मूर्ती में शामिल है इसीलिए यह विग्रह त्रिमूर्ती माना जाता है। मंदिर के बाहरी आंगन में भगवान श्री अय्यप्प का मंदिर बना हुआ है। यह मंदिर अरट्टूपुझा पूरम उत्सव के लिए अत्यंत प्रसिद्द है। मंदिर के परिसर में एक गर्भ गृह और एक नमस्कार मंडपम है जहां रामायण कालीन चित्र बने हैं और नवग्रहों को दर्शाती हुई लकड़ी की नक्काशी और प्राचीन भित्ति चित्र भी हैं। त्रिप्रायर श्री राम मंदिर के प्रांगण में पारंपरिक कलाओं जैसे कोट्टू  जो एक प्रकार काकी स्थानीय नाटय कला है का नियमित प्रदर्शन किया जाता है। 

 

Posted By: Molly Seth