भारत में कई ऐसे देवी-देवताओं के मंदिर हैं जो अपनी परंपरा, चमत्कार, शक्ति के कारण प्रसिद्ध है। हर देवी-देवता के मंदिर की कोई न कोई खासियत होती है। जिसके कारण लोगों के मन में हर देवी-दवता के लिए अपनी ही श्रृद्धा होती है। इसी तरह एक मंदिर बिहार में है जो अपने चमत्कारों के कारण प्रसिद्ध है। इस मंदिर में दूर-दूर से ही नहीं विदेशों से भी भक्त आते है।

बिहार के भभुआ में मुंडेश्वरी मंदिर है जो कि काफी प्राचीन और धार्मिक स्थलों में से एक है। इस मंदिर को कब किसने बनाया है इस बारें में कहना कठिन है, लेकिन यहां पर लगे शिलालेख के अनुसार उदय सेन नामक क्षत्रप के शासन काल में इसका निर्माण हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह मंदिर भारत के सर्वाधिक प्राचीन व सुंदर मंदिरों में एक है। इस मंदिर में पूजा 1900 सालों से लगातार होती चली आ रही है। यह मंदिर पूरी तरह से जीवंत है। पौराणिक और धार्मिक प्रधानता वाले इस मंदिर के मूल देवता हजारों वर्ष पूर्व नारायण अथवा विष्णु थे। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार भगवती ने इस इलाके में अत्याचारी असुर मुण्ड का वध किया। इसी से देवी का नाम मुंडेश्वरी पड़ा।

इस मंदिर के बारें में यहां पर स्थित शिलालेखों में इसका ऐतिहासिकता बताई गई है। इसके अनुसार 1938 से लेकर 1904 के बीच ब्रिटिश विद्वानों आरएन मार्टिन फ्रांसिस बुकानन व ब्लाक ने मंदिर का भ्रमण किया। ब्लाक ने 1903 में मंदिर परिसर के शिलालेख का एक खंड प्राप्त किया। इसका दूसरा खंड 1892 में खोजा गया। 1790 ई में दो चित्रकारों थामस एवं विलियम डेनियल ने इस मंदिर का चित्र बनाया। चित्र पटना संग्रहालय में सुरक्षित है। 1878 में विलियम हंटर ने बंगाल सर्वे में इसकी जानकारी दी।

भारत के प्राचीनतम मंदिरों में भभुआ का मुंडेश्वरी देवी मंदिर। मनौती पूर्ण होने पर यहां बकरे की रक्तहीन बलि दी जाती है। बलि के दौरान एक बूंद खून नहीं गिरता। इसे अहिंसाबलि का भी लोगों ने नाम दिया है। कोई श्रद्धालु बकरे को मंदिर के अंदर बलि के लिए ले जाता है तो यहां के पुजारी कुछ मंत्र पढ़ते हैं और उस पर जल अक्षत छिड़कते ही वह बेदम होकर प्रतिमा के नीचे लेट जाता है। वह तब तक वहां पड़ा रहता है जब तक पुजारी पुन: उसके ऊपर अछत्त व फूल न छिड़क दे। बकरा जीवित होते ही लोग उसे बाहर छोड़ देते हैं। पंवरा पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर की महिमा चहुंओर विद्यमान है। मंदिर के मध्य भाग में एक शिवलिंग है उसके चारों ओर चार मुख हैं। इसी से चतुर्मुख शिवलिंग भी कहा जाता है पर सनातन धर्म की परंपरा में भगवान शिव को पंचमुख कहा गया है। यह पत्थर से बना हुआ अष्टकोणीय मंदिर है जो दुर्लभ है। 19वीं सदी में श्रीनगर के पास स्थित शंकराचार्य मंदिर भी अष्टकोणीय मंदिर है। इस मंदिर में चारों तरफ द्वार है। पूर्वी द्वार को ब्रिटिशकाल से बंद कर दिया गया। मंदिर की छत को सुदृढ़ करने के लिए एक स्तंभ भी बनाया गया है। इसके पाश्‌र्र्वभाग में देवी मुंडेश्वरी की प्रतिमा उत्तराभिमुख रख दी गई है, जो अपने स्थान पर नहंीं है।

यह प्राचीन मंदिर क्षतिग्रस्त हो चुका है। मंदिर का गर्भगृह अक्षुण्ण है। यद्यपि इसका शिखर धराशायी हो चुका है। करीब सौ साल पहले अंग्रेजों ने एक सामान्य छत बनवाई थी। चारों ओर टूटे हुए कलात्मक अवशेष आज भी बिखरे हैं। उसे देखकर ऐसा लगता है कि मुख्य मंदिर के अतिरिक्त चारों ओर कई मंडप भी प्राचीन काल में रहे होंगे। मुख्य मंदिर में पश्चिम में पूवार्भिमुख विशाल नंदीजी की मूर्ति है। मुख्य मंदिर के दक्षिण भाग में चार स्तंभ के आधार चिह्न हैं। इस स्थान पर आयताकार शिला होने का भी चिह्न है। इस शिला का परिमाप देवी मुंडेश्वरी की प्रतिमा के आधार के समरूप होने के कारण स्पष्ट इसे देवी के मुख्य मंदिर के रूप में चिह्नित किया गया है। इसका पुर्ननिर्माण आवश्यक है। इस परिसर से एक शिलालेख उपलब्ध है। इसका प्रथम अध्ययन 1907 ई में डॉ. आरएन बनर्जी ने किया। इस शिलालेख में महाराज उदयसेन, कुलपति भागुदलन एवं दंडनायक जोगिमत इन तीन नामों का उल्लेख है।

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Posted By: Preeti jha