लेखिका के बारे में : पल्लवी राघव की रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। कुछ साहित्यिक पोर्टल्स से भी संबद्ध हैं। कविता प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला है। संप्रति : मुंबई में । उस रोज करवटें बदलते हुए मैंने लगभग सारी रात गुजार दी मगर नींद मुझसे कोसों दूर थी। बहुत कोशिश की कि राघव मुझसे मन की बात कहें, मुश्किल में उनका साथ दूं मगर राघव से उनकी तकलीफों के बारे में बात करना मुश्किल था। उनके सुख में मेरा हिस्सा था मगर दुख में नहीं। अपनी चिंताओं को वह खुद तक सीमित रखना चाहते थे, किसी से शेयर नहीं करना चाहते थे। पता नहीं वह ऐसे क्यों थे? हमारी शादी के तीन साल पूरे हो गए थे। शुरू में मैंने यही सोचा कि समय के साथ राघव मुझे जानेंगे तो अपनी बातें जरूर बताएंगे। समय बीतता गया मगर राघव नहीं बदले। हालांकि वह मुझसे बहुत प्रेम करते थे, दुनिया का हर सुख मुझे देना चाहते थे। घर के छोटे-छोटे कार्यों में मेरी मदद करते। चाय और खाना बनाने जैसे कामों में जब वह मेरी मदद करते तो मन को बेहद सुकून मिलता। कोई निर्णय लेते हुए वह मेरी राय की अपेक्षा रखते तो मैं खुद को बेहद खुशकिस्मत समझती कि मुझे राघव जैसे जीवनसाथी मिले। एक दिन की बात है। उनके घर से फोन आया था और वह केवल हां या न में जवाब दे रहे थे। फोन पर बात करने के बाद वे खामोश और उदास से हो गए। वे इतने चुप थे कि उनका साथ होना भी मुझे अखर रहा था। मैंने कई बार उनसे पूछा कि क्या कोई बात है? इस सवाल को वह टाल गए। मैं राघव के इस व्यवहार से परेशान हो गई। राघव जानते हैं कि उनका यह व्यवहार मुझे परेशान करता है फिर भी न जाने उनके मन में कितना कुछ दबा है, जो वह मुझसे कभी शेयर नहीं करते या नहीं करना चाहते। मैंने इस बात की तह तक जाने का निश्चय किया और इसमें अपनी प्रिय सहेली और मनोचिकित्सक डॉ. अंजली से राय लेने के बारे में सोचा। अगली सुबह राघव जैसे ही तैयार होकर ऑफिस निकले, मैंने उन्हें विदा करते ही अंजली को फोन लगाया। मैं और अंजली बचपन से गहरे दोस्त रहे हैं और शादी के बाद भी हम दोनों संयोग और किस्मत से एक ही शहर में हैं। मैं अपने सभी मन की बातें अंजली से कहती हूं और वह मुझसे। इस तरह हम अपना मन हलका कर लेते हैं। मैंने अंजली को फोन लगाया, 'हेलो अंजली, कैसी हो? 'अरे पायल! इतनी सुबह... सब ठीक तो है न? अंजली ने घबराते हुआ पूछा। हम दोनों सहेलियां अकसर सुबह के काम निपटा कर एक-दूसरे से बातें करते थे। अंजली बस शाम 3 घंटे प्रैक्टिस करती थी। सुबह और दोपहर वह फ्री रहती थी। 'अरे ऐसी कोई बात नहीं है, सब ठीक ठाक है, केवल राघव...। पता नहीं क्यों कल रात से बेहद परेशान नजर आ रहे हैं। मैंने उनसे परेशानी का कारण पूछा तो वह टाल गए। वैसे वह बेहद अच्छे हैं, सारी बातें समझते भी हैं मगर न जाने क्यों उनकी यह बात मुझे कचोट जाती है...। 'पायल तुम परेशान मत हो। मैं कुछ देर में तुम्हारे घर आती हूं, बैठ कर इस पर बात करते हैं। कोई न कोई सूरत निकल आएगी। अंजली से बात करके दिल को तसल्ली मिली और मैंने फोन काट दिया। जल्दी-जल्दी घर के कामकाज निपटाने लगी, ताकि आराम से बैठ कर अपनी सहेली से बातचीत कर सकूं। मैं तैयार होकर लिविंग रूम में गई ही थी कि राघव का फोन आ गया। 'पायल मैं जरा जल्दी में था, तुमसे ठीक से बाय भी नहीं कह सका। तुमने नाश्ता तो कर लिया न? चलो, शाम को मिलते हैं। मैं आज जल्दी आने की कोशिश करूंगा। राघव जानते थे कि मैं उनसे नाराज थी क्योंकि उन्होंने मुझे अपनी उदासी का कारण नहीं बताया। न जाने ऐसी कौन सी बात है, जो राघव अपना प्यार-स्नेह खुल कर लुटाते हैं लेकिन अपने दर्द खुद तक ही सीमित रख लेते हैं। मैंने राघव से कहा, 'अभी अंजली आने वाली है। मैं तो बस उसी का इंतजार कर रही हूं। 'अरे वाह...तब तो अच्छा है। जी भर कर अपनी दोस्त से बातें करो...। कह कर राघव ने फोन काट दिया। कुछ ही देर बाद अंजली आ गई। हमने कुछ देर इधर-उधर की बातें की। फिर अंजली ने कहा, 'देखो पायल, जीजाजी के ऐसे बर्ताव के पीछे जरूर कोई वजह होगी। उनके मन में ऐसा कुछ होगा, जो वह शेयर नहीं करना चाहते। तुम पहले तो मुझे उनके परिवार के बारे में सब कुछ बताओ। विश्वास रखो, हर समस्या का हल दुनिया में मौजूद है, केवल उसे तलाशने की जरूरत है। 'अंजली, राघव के बारे में तो तुम सब कुछ जानती ही हो। मैं क्या बताऊं? मुझे अंजली की बातें समझ में नहीं आ रही थीं। यूं भी राघव के बारे में मैं जितना जानती थी, उतना सब अंजली को भी मालूम था। अब कुछ नया होता तो बताती। अंजली ने फिर कहा, 'पायल, मैं राघव के बारे में उतना नहीं जान सकती, जितना तुम। वैसे तुमने मुझे बताया था कि राघव के पापा ने दूसरी शादी की थी। राघव जब नवीं क्लास में थे, तभी उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पापा ने दोबारा शादी कर ली थी और राघव माता-पिता के इकलौते बेटे हैं...। 'हां अंजली, यह सब कुछ सही है और इसे तो सभी जानते हैं..., मैंने कहा। 'देखो पायल, तुम्हारी शादी को तीन साल हो गए हैं। तुम इस बीच कभी अपनी ससुराल नहीं गई, न ही सास-ससुर तुम्हारे पास रहने आए। एक बार मैंने तुमसे कहा भी था कि तुम नहीं जा पातीं तो एक बार सास-ससुर को जरूर बुलाओ। आखिर यह उनके बेटे का भी घर है और इस घर पर जितना हक तुम्हारा है, उतना ही उन लोगों का भी है। उस समय तुमने मुझे यह कह कर टाल दिया था कि राघव ही नहीं चाहते कि उनके माता-पिता यहां आएं। देखो पायल, जरूर ऐसी कोई बात है कि राघव अपने माता-पिता से दूरी बना कर रखते हैं। कई बार पति को समझाना भी पडता है। जरूरी नहीं है कि वह हमसे अपने दिल की हर बात शेयर करता हो। राघव की पीडा उसकी पारिवारिक उलझन ही है। बचपन में मां का साया उठ गया, किशोर उम्र में एकाएक मां के रूप में किसी दूसरी स्त्री को देखा तो मन इसके लिए तैयार नहीं हो पाया, जिस पिता ने मां के जाने के बाद सारा ध्यान बेटे पर दिया हो, एकाएक उसका ध्यान अपनी नई पत्नी की ओर बंट जाए तो बच्चे को थोडा तो खलता ही होगा। यह भी तो हो सकता है कि राघव ने अपनी दूसरी मां को मन से स्वीकार ही न किया हो और इसी वजह से पिता से भी दूरी बना ली हो। अब यही दूरी उसे खाए जा रही है। इस बात को न राघव समझ पा रहा है और न तुम। राघव तुमसे बहुत प्यार करता है पायल, अब तुम्हारी बारी है कि तुम उसे अपने परिवार का सुख वापस दो, उसके माता-पिता से उसकी यह दूरी मिटाओ। मेरे हिसाब से यही इसका उपाय है...। अंजली की कही गई यह बात मुझे राघव के बारे में बहुत कुछ जानने को मजबूर कर गई। मुझे उनका बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था एक साथ नजर आने लगे। इस पूरे दौर में मैंने अपने विश्लेषण में पाया कि राघव बेहद अकेले रहे, वह खुद की पीडाओं में उलझते गए और यही दर्द उन्हें लगातार खाए जा रहा है। शायद इस दर्द को मैं भी महसूस नहीं कर सकी। आज अंजली ने हकीकत बयां की तो राघव के मन को समझने का मौका भी मुझे मिल गया। मैंने अंजली को तहेदिल से धन्यवाद दिया और यह संकल्प किया कि कुछ भी हो जाए, मैं राघव की पत्नी होने के साथ ही परिवार की बहू होने का फर्ज भी निभाऊंगी। अगले दिन राघव के जाते ही मैंने अपनी ससुराल में फोन लगाया। 'हेलो...मम्मी जी, मैं पायल बोल रही हूं...। 'अरे बेटा...कैसी हो तुम? हमें तो लगा, हमारी बहू हमें भूल ही गई है। मम्मी की ऐसी अपनत्व भरी बात से मन को सुकून मिला। बस फिर क्या था, मैंने फोन पर ही मम्मी का दिल्ली आने का कार्यक्रम फिक्स कर दिया। मम्मी ने कई बार कहा भी कि राघव कहीं नाराज न हो जाए मगर मैंने जिद करके उन्हें मना ही लिया। यह बात सच थी कि राघव ने कभी भी न मुझे अपने घर बनारस ले जाने की बात कही और न ही मम्मी-पापा को यहां बुलाने की मगर अब मैं इतना तो जान ही गई थी कि इंसान को पूर्ण करने के लिए महज एक ही रिश्ता काफी नहीं होता, हर रिश्ता उतना ही जरूरी होता है। मां की ममता, पिता का दुलार, भाई-बहनों की नोक-झोंक और जीवनसाथी का प्यार....इंसान के एक मन में इतनी तरह के स्नेह की जगह बनी होती है। मैंने मां से कहा कि वह और पापा जल्द से जल्द यहां आ जाएं। राघव को इसकी कुछ भी खबर नहीं थी। चार दिन बाद मैं सुबह जल्दी तैयार होने लगी तो राघव ने पूछा, 'कहां जा रही हो इतना बन-संवर कर और वो भी इतनी सुबह-सुबह? मैंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'रेलवे स्टेशन। मेरे सास-ससुर की ट्रेन कुछ ही देर में नई दिल्ली स्टेशन पहुंचने वाली है, उन्हें ही लेने जा रही हूं। अगर आप आना चाहते हैं तो आ सकते हैं। राघव की शक्ल देखने लायक थी। वह बार-बार मुझसे कहे जा रहे थे कि यह कैसे हो सकता था? उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनके मम्मी-पापा उनके घर आ सकते हैं। ...रविवार था और राघव की छुट्टी थी। राघव के चेहरे को उस वक्त पढ पाना बेहद मुश्किल था। उस पर खुशी, उत्सुकता और आश्चर्य जैसे कई भाव गड्डमड्ड हो रहे थे लेकिन चेहरे पर नई चमक थी, जिसे देखने को मैं तरस सी गई थी। वह जल्दी-जल्दी तैयार हुए और हम स्टेशन पहुंचे। शादी के बाद यह पहला मौका था, जब मैं अपने सास-ससुर से मिल रही थी। मैंने सिर पर चुन्नी ले ली। मैं खुद को आज पहली बार बहू की तरह महसूस कर रही थी और यकीन करें, यह एक अलग ही एहसास था। हम दोनों ने ही एक साथ झुक कर मम्मी-पापा को प्रणाम किया और फिर राघव ने गाडी स्टार्ट की। पापा राघव के बगल वाली सीट पर बैठे और मम्मी पीछे मेरे साथ। गप्पें मारते हुए हम घर पहुंच गए। राघव की स्फूर्ति देखने लायक थी। घर पहुंचते ही वह मुझे चाय-नाश्ता तैयार करने को कह बाहर चले गए और कुछ ही समय बाद पापा की पसंद की सब्जियों-फलों और मिठाइयों से लदे-फदे घर लौटे। हमने न जाने कितने अरसे बाद परिवार की तरह एक साथ बैठ कर खाना खाया। हालांकि राघव सिर झुकाए चुपचाप खा रहे थे मगर मैं मम्मी-पापा से खूब बातें कर रही थी। थोडे ही दिनों में मैंने अपनी सास को बेहद करीब से जान लिया। उन्होंने बताया कि उनकी बहुत कम उम्र में शादी हुई थी मगर कुछ ही समय बाद उनके पति गुजर गए। उनके भाई ने दोबारा राघव के पापा से उनकी शादी करवाई। मम्मी और पापा ने राघव की खातिर अपनी कोई संतान नहीं होने दी। वह राघव से बेहद प्यार करती थीं मगर राघव अपने मन के भीतर बैठी शंकाओं को नहीं निकाल पाए। मम्मी-पापा को हमारे घर आए कुछ दिन हो चले थे। मैंने देखा कि अब राघव भी उनसे बातचीत करने लगे थे, हालांकि मम्मी से उनकी बातें अभी भी कम होती थीं। मैं मम्मी के धैर्य की कायल हो गई थी। मैंने राघव को बताया कि उनकी खातिर मां ने दूसरे बच्चे की चाह को नकार दिया। मम्मी-पापा को आए 15 दिन हो चुके थे कि मम्मी ने कहा, 'पायल बेटा..., अब हमें इजाजत दो। बीच-बीच में आते रहेंगे और तुम लोग भी अगली छुट्टियों में घर आने का कार्यक्रम बनाओ। वह यह कहते हुए बेहद इमोशनल हो गई थीं। कहने लगीं, 'बेटा, मैंने जिंदगी में पहली बार संतान का सुख देखा है। तुम मेरी बहू नहीं, बेटी हो। मेरा भी गला भर आया। कुछ बोलना चाहती थी मगर बोल न सकी मगर एकाएक राघव आगे आए और आंखों में आंसू भर कर बोल उठे, 'मम्मी, आप अपने बेटे को छोड कर वापस जाना चाहती हैं? प्लीज अब तो माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बडी भूल हो गई, मैंने आपको कभी मां का दर्जा नहीं दिया लेकिन इतने दिन आपके साथ रह कर लगा कि मेरे जीवन में यही तो एक कमी थी, जिसके कारण मुझे कहीं भी चैन नहीं मिल पाता था....। राघव का यह कहना था कि मम्मी फूट-फूट कर रोने लगीं। मैंने कुछ पल मां-बेटे को साथ छोड दिया और पापा के पास चली गई। पापा ने मुझसे कहा, 'पायल, तुम जैसी बहू पाकर मैं आज खुद को खुशकिस्मत पा रहा हूं। तुमने वो कर दिखाया, जो अब तक मुझे नामुमकिन लगता था। 'नहीं पापा, मैंने कोई बडा काम नहीं किया, मैंने बस अपने घर को बचाया है। मम्मी-पापा चले गए लेकिन हमारे मन में बैठी शंकाओं को दूर कर गए। उनके जाने के बाद राघव ने मुझसे कहा, 'पायल, तुम्हें मैंने प्यार तो बहुत किया है लेकिन जिस तरह तुमने मेरे मन के दर्द को समझ कर उसका इलाज किया, इसके बाद तो तुम्हारे प्रति मेरे मन में आदर का भाव बहुत बढ गया है...। आज हम सुखी पारिवारिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं और सच कहूं तो इसका सारा श्रेय मेरी सहेली अंजली को जाता है।