क्या किन्नी बस मेरी है? 'तो क्या मैं घर में बैठा रहूं? 'लेकिन तुम ये क्यों नहीं सोचते कि बॉस ने मुझे आज अर्जेंट काम दिया है...। 'ओह, तुम और तुम्हारा बॉस! 'मैं जा रही हूं... बाई के आने तक तुम रुको 'लेकिन वो नहीं आई तो...? 'तो तुम जानो... 'लेकिन उसे तो बुखार है... 'ओफ्फोह...अब मेरी नौ सत्रह की बांद्रा लोकल भी छूट जाएगी... 'उफ! किन्नी यानी साढे पांच साल की, घुंघराले बालों वाली प्यारी सी सीनियर केजी की स्टूडेंट, जो रोज की तरह आज भी इस उफ! तक पहुंच कर खत्म होती मम्मी-पापा की लडाई की अभ्यस्त हो गई है। मम्मी-पापा रोज किसी न किसी बात पर झगडते हैं। कभी पैसे के लिए कट्टी होती है तो कभी काम के लिए, कभी कहीं जाने के नाम पर तो कभी किसी दोस्त के घर आ जाने पर...लडाई का सिलसिला जारी रहता है। हर बात घूम-फिर कर किन्नी पर आकर अटक जाती है। किन्नी की पढाई, उसके लिए बाई, उसके मैनर्स, होमवर्क, उसके स्कूल का फंक्शन, पेरेंट्स मीटिंग और आज... किन्नी का बुखार। इस उफ के बाद उसे पूछने वाला कौन था! मम्मी-पापा कहते हैं, 'आई लव यू बेटा...मेरा प्यारा बच्चा...। प्यार से मम्मी उसे किन्नू भी बुलाती हैं। वे लोग उसे लेकर संडे को बाजार जाते हैं, मॉल ले जाकर घुमाते हैं, जो भी उसे चाहिए, सब दिलाते हैं। किन्नी के पास ढेर सारे कपडे, खिलौने और क्रेयॉन्स कलर्स हैं। उसकी बर्थ डे पार्टी भी किसी शानदार होटल में मनाई जाती है। पापा-मम्मी के ढेरों दोस्त, सहेलियां और उनके बच्चे आते हैं लेकिन किन्नी को क्या बस यही चाहिए...? मम्मी रोज ऑफिस जाने से पहले मेड को सारी बातें समझाती हैं, 'किन्नी को दूध दे देना... 'हेल्थ सप्लीमेंट देना मत भूलना, 'और हां-उसे कॉर्नफ्लेक्स दे देना... 'हैंड सैनिटाइजर जरूर रखना, 'पानी की बॉटल गर्म पानी से साफ करना... और भी न जाने क्या-क्या...। इस समय पापा डाइनिंग टेबिल पर पेपर में सिर छिपाए न जाने क्या-क्या पढते रहते हैं, फिर ऑफिस के लिए तैयार हो जाते हैं। उनके मुंह से किन्नी चंद वाक्य ही सुन पाती है, जैसे, 'गुड, वेरी गुड और कीप इट अप। वैसे किन्नी को लगता है, वह 10 में से पूरे 10 अंक लाए तो भी पापा यही कहेंगे और जीरो लाए, तो भी...। किन्नी का रिपोर्ट कार्ड देखते हुए भी वे न जाने कहां-कहां देखते रहते हैं? हर सुबह अखबार में खोए पापा उसे अच्छे नहीं लगते। वह उनसे ढेर सारी बातें करना चाहती है, गोद में बैठ कर उन्हें अपने फ्रेंड्स, स्कूल और नई टीचर के बारे में बहुत कुछ बताना चाहती है। ढेरों बातें हैं उसके पास। जैसे- बिल्डिंग में घूमती डॉगी ब्राउनी के चार बच्चों की बातें, जिनके उसने मजेदार नाम रखे हैं...मगर पापा तो जब रात में दफ्तर से लौटते हैं, वह सो चुकी होती है। एक दिन रात में उसने जागने की कोशिश की मगर पापा-मम्मी के झगडे की आवाज से डर गई और सोने का बहाना करके पडी रही। मम्मी सुबह से ही भागने लगती हैं। टिफिन तैयार करतीं, नहातीं, शांता बाई को समझातीं और बीच-बीच में किन्नी को थपथपातीं...। मम्मी उसका ध्यान रखने की पूरी कोशिश करती हैं मगर क्या किन्नी यही चाहती है? कभी-कभी उसे लगता है कि सामने वाली खन्ना आंटी, बिन्नू और यहां तक कि शांता बाई का ओमू भी उससे ज्यादा खुश है। बिन्नू के पास न तो उस जैसा सजा-संवरा बेडरूम है, न सिंथेसाइजर, न बार्बी, न ड्रीम हाउस और न ही ढेर सारे कपडे व खिलौने। एक दिन वह चुपचाप बिना बताए खन्ना आंटी के यहां चली गई। वहां देखा कि खन्ना अंकल बिन्नू को नहलाते हुए गाना गा रहे हैं। वह बिन्नू को गुदगुदाते और वह खिलखिला कर हंस देता। फिर आंटी ने एक टॉवल में बिन्नू को लपेट कर गोद में उठा लिया और उसके गाल पर अपना गाल रगड दिया। किन्नी खिलखिलाते-मुस्कुराते बिन्नू को देख रही थी। आंटी उसे भी प्यार करती हैं, सो किन्नी को भी पोहा खाने को दिया। आंटी बिन्नू को अपने हाथ से खिलाती रहीं। किन्नी की आंखें जैसे खन्ना आंटी पर टिक गईं। हर कौर के साथ आंटी का चेहरा खुशी से भर जाता था। किन्नी को अपनी ओर इस तरह देखते हुए आंटी ने पूछा, 'क्या बात है बेटा, क्या देख रही हो? अब किन्नी क्या बताए कि वह तो अपने घर के बडे बाथरूम में शांता बाई के कठोर हाथों की रगड महसूस कर रही है। डाइनिंग टेबल पर रखे दूध और उस ब्रेकफास्ट के बारे में सोच रही है, जिसे कभी-कभी यूं ही निगल जाती है और कभी शांता बाई की आंख बचा कर पडोस की बिल्ली के कटोरे में डाल आती है। उसे अपने घर का कुछ भी अच्छा नहीं लगता। पता नहीं, क्या कहानी के बारे में : किन्नी के माता-पिता उसे मेरे क्लिनिक में लेकर आए थे। उनका मानना था कि हर सुख-सुविधा देने के बावजूद बच्ची खुश नहीं रहती। कहानीकार के बारे में : मनोविज्ञान में शोध कार्य के बाद पिछले 30 वर्षों से बतौर मनोवैज्ञानिक सलाहकार कार्यरत, खासतौर पर बच्चों के लिए काम। लिखना शौक भी है और अनुभव बांटने का माध्यम भी। अब तक कई लेख और कहानियां प्रकाशित। संप्रति : थाणे (महाराष्ट्र) चाहती है किन्नी? मम्मी को जब भी ऑफिस में ज्यादा काम होता है, वे शांता बाई को देर तक रुकने के लिए मना लेती हैं। तब शांता बाई अपने बेटे ओमू को यहां ले आती है। दुबला-पतला सा ओमू भी किन्नी की उम्र का है। मम्मी की खास हिदायत है कि जब ओमू यहां आए तो साफ-सुथरा रहे, किसी सामान को हाथ न लगाए, किन्नी के खिलौने न छुए और कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहे। शांता बाई इसका ध्यान रखती है पर ओमू किन्नी के सामान व खिलौनों को उत्सुकता और हसरत से देखता रहता है। शांता बाई हर समय उसे अपने साथ रखती है। किचन या बाथरूम में कपडे धोते समय ओमू मां के पीछे-पीछे घूमता रहता है और वो उसे कहानी सुनाती जाती है- कभी गणेश जी की, कभी चूहे-बिल्ली की तो कभी सींग वाले राक्षस और राजकुमारी की। एक दोपहर किन्नी सोकर उठी तो देखा, शांता बाई किचन में चटाई बिछाए सो रही थी और ओमू अपनी मां की बांहों में सिर छुपाए मजे से सो रहा था। थोडी देर में ओमू शायद सपने में डर गया तो गहरी नींद में होने पर भी शांता बाई ने ओमू को थपथपा दिया। किन्नी सोचने लगी, वह भी तो कितनी बार रात में डर कर जाग जाती है। अकेले बडे से कमरे में सोते हुए उसे डर लगता है। अंधेरे में यूं महसूस होता है, मानो बेडरूम में रखे बडे-बडे टेडी बियर्स और मिकी माउस उसे घूर रहे हैं, उसे वॉचमैन अंकल की सीटी से डर लगता है, कुत्ते के रोने की आवाज से वह सहम जाती है और कांपते हाथों से डरती-डरती मम्मी के कमरे का दरवाजा खटखटाती है। मम्मी उसे अपने पास लिटाती हैं पर थोडी ही देर में उनकी नींद खराब होने लगती है। पापा चिढ उठतेे हैं, 'उफ! रात में भी चैन नहीं...। मम्मी उसे फिर से समझाते हुए कमरे में सुला आती हैं, 'मेरा ब्रेव बच्चा किसी से नहीं डरता...। किन्नी की पलकें गीली हैं। वह नहीं चाहती यह आलीशान कमरा या ढेरों खिलौने...। उसे तो ढेर सारा प्यार चाहिए, मम्मी-पापा चाहिए, जो उसे अपने पास सुलाएं, प्यार करें, उसे कहानी सुनाएं, डांटें...। कभी-कभी का प्यार और रोज का यह उफ उसे अच्छा नहीं लगता। नहीं बनना उसे 'ब्रेव बच्चा'। काश कि उसके पास कोई परी आ जाए, जो जादू की छडी घुमा कर उससे पूछे, 'बोलो किन्नी, क्या चाहिए तुम्हें? वह कहे, 'मुझसे मेरा सब कुछ ले लो पर मेरे मम्मी-पापा को बिन्नू के मम्मी-पापा जैसा बना दो, मेरे सारे पैसे शांता बाई को दे दो ताकि वह मेरे घर न आए। इससे मम्मी-पापा को मेरे पास रुकना पडेगा और वे भी खन्ना अंकल-आंटी की तरह मुझे अपने हाथों से खिलाएंगे। मेरे पास रहेंगे...। सच्ची, तब कितना अच्छा होगा न...!