कहानीकार के बारे में : श्रीप्रकाश श्रीवास्तव की लगभग डेढ सौ कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं, समय-समय पर आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण। संप्रति : वाराणसी में रहते हुए स्वतंत्र लेखन।

शुभि सुबक रही थी। सुबकने का जो कारण उसने बताया, उसे सुनकर मैं अपराध-बोध से घिर गया। मेरे पास इसके एवज में सफाई देने के लिए कुछ नहीं था क्योंकि दोनों की शादी कराने में मेरी भूमिका महत्वपूर्ण थी। यह अलग बात है कि मैं यह कहकर खुद को बचा सकता था कि मेरा काम है रिश्ता बताना, बाकी दोनों पक्ष जानें-समझें। तो क्या मैं अपनी जिम्मेदारी से बच सकता था? शुभि मेरी चचेरी बहन थी। वर्षों तक मेरे और शुभि के पापा यानी मेरे चाचा के बीच कोई संपर्क नहीं था। शुभि को जब मैंने पहली बार देखा, वह 5 साल की थी, वह भी गांव में।

उसके बाद न चाचा से मेरी मुलाकात हुई और न ही उनके घर जाना हुआ। गांव जाता तो बाहर ही बाहर अपने हिस्से का अनाज लेकर बनारस लौट आता। इस बीच शुभि ने एम.ए. किया। यह तब जाना, जब लंबे अरसे के बाद मेरा इलाहाबाद जाना हुआ। मुझे देखते ही चाचा खुश हो गए। अपने खून, परिवार, खानदान की दुहाई देते हुए मुझे सहर्ष सबके बीच ले गए। उनकी पांच बेटियां थीं और एक बडा लडका। तीन की शादी हो चुकी थी। बडा बेटा राकेश सरकारी स्कूल में अध्यापक था। बचपन में मैं उसे बहुत तंग किया करता था। अब लंबा-चौडा समझदार युवक हो गया था राकेश। चाचा ने शुभि की तरफ इशारा करते हुए चुहलबाजी की, 'इसी नटुली की शादी करानी है तुम्हें, कोई योग्य लडका हो तो बताओ। शुभि ने अपने पिता के प्रति एक मीठी नाराजगी जाहिर करते हुए मुझे नमस्कार किया। शुभि की लंबाई पांच फिट से ज्यादा न थी। नाक नक्श भी बस ठीक-ठाक से ही थे। हां, रंग काफी खुला हुआ था।

चाचा बार-बार यही दुहराते रहे कि अपना खून अपना ही होता है। तब मैं कुछ ज्यादा ही जज्बाती हो गया। आननफानन दिमाग दौडाने लगा तो एक नाम कौंध गया। मेरी बहन की जिठानी का भाई रूपेश शुभि के लिए योग्य वर हो सकता है। रूपेश बिजली विभाग में लेखा लिपिक था। बनारस में उसके पिता का बनवाया एक बडा सा मकान था। बहनों की शादी हो चुकी थी, लिहाजा कोई जिम्मेदारी नहीं थी। चाचा इस कदर उतावले हो गए थे कि जल्दी से जल्दी बेटी के हाथ पीले करना चाहते थे इसलिए तुरंत मुझे फोन लगाने को कहा। मोबाइल मेरे हाथ में रखते हुए बोले, 'शुभ काम में देरी कैसी? अभी फोन लगा लो। एकाएक मैं सबका चहेता हो गया।

चाची, राकेश, उसकी बहनें सब मेरे आवभगत में लग गए। यह मेरे लिए अनपेक्षित था क्योंकि इतना सम्मान मुझे पहले कभी नहीं मिला था। मैं कृतज्ञ था। मैंने भी मन बना लिया कि इस रिश्ते के लिए अपनी ओर से कोई कमी नहीं छोडूंगा। मैंने अपनी बहन की जिठानी से रिश्ते की बात छेडी। उसके सास-ससुर थे नहीं, इसलिए शादी की बात उसी से की जानी थी। लडकी के बारे में जब सुना कि अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. है तो वह बेहद खुश हो गईं। मैंने तत्काल चाचा जी को बनारस आने के लिए खबर भिजवाई। लडके के पिता के बनवाए गए विशालकाय घर को देख कर तो चाचा गदगद हो गए। वह मुक्त कंठ से मेरी सराहना करने लगे। थोडी देर बाद वह लडका भी सामने आ गया,

जिससे शुभि की शादी की बात चलाई जानी थी। वह खुद पांच फीट दो इंच लंबा था, यानी शुभि से जरा ही फर्क रहा होगा। अब तो चाचा के मन में शुभि की लंबाई को लेकर फंसा कांटा निकल गया। उन्हें हमेशा खटका लगा रहता था कि कहीं छोटा कद शुभि को नापसंद करने की वजह न बन जाए। लडके का कद देख उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि शादी में कोई अडचन नहीं आएगी। चार मुलाकातों में ही लेनदेन तय हो गया। रह गई लडकी दिखाने की बात। किसी को तकलीफ न हो, इसलिए मैंने रेलवे और बस स्टैंड के पास के एक होटल में लडकी दिखाने का व्यवस्था की। तय तिथि को सभी लोग होटल पहुंच गए। इंतजार था तो मेरा। मैं सुल्तानपुर में नौकरी करता था। वहां से बस से पहुंचना था। मुझे भरोसा था कि समय पर पहुंच जाऊंगा मगर रास्ते भर मन बडा बेचैन था। पता नहीं क्या था, जो मुझे परेशान कर रहा था। रह-रह कर मुझे एक बात कचोट रही थी। एक ऐसा सच, जिसे मैं तो जानता था मगर चाचा जी को बता न सका। शायद यह मेरी अपरिपक्व सोच थी कि शादी कराने का पुण्य कमाने के चलते मैंने वह बात जान-बूझ कर भुला दी जबकि मुझे वह बात चाचा जी के परिवार को बता देनी चाहिए थी। इसके बाद वह चाहे जो फैसला लेते। मेरे सिर से बोझ तो उतर जाता।

जैसे-जैसे बनारस नजदीक आ रहा था, मेरी अकुलाहट बढती जा रही थी। कहूं तो कैसे? न कहूं तो आजन्म एक अपराध-बोध से ग्रस्त रहूंगा। आखिर भविष्य में मेरी भी शादी होगी, मेरी भी बेटी होगी और मुझे उसकी शादी भी करनी होगी। अगर उसके साथ भी ऐसा हुआ तो? यह सोचने मात्र से ही मैं सिहर गया। अगले ही पल विचारों ने करवट ली। मैं सच उगल भी दूं तो मुझे चार बातें और सुनने को मिल जाएंगी। पूरी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी। चाचा जी की नजरों में भी गिरूंगा।

अंतत काफी उधेडबुन के बाद मैंने फैसला लिया कि वह सच चाचा जी से कहने के बजाय उनके बडे दामाद को बताऊंगा। मेरी नजर में वह एक सुलझे हुए इंसान थे। इससे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। कम से कम चाचा जी यह तो नहीं सोचेंगे कि मैंने उन्हें अंधेरे में रखा। इसके बाद रिश्ता करना है या नहीं, यह चाचा और उनके दामाद फैसला करें। जैसे ही मैं होटल पहुंचा, सभी के चेहरे खिल गए। राकेश और उसकी पत्नी ने मेरे पैर छुए। चाचा-चाची अपनेपन के साथ मुझे शुभि के कमरे में ले गए। 'देखो कैसी लग रही है शुभि? चाचा ने पूछा। मैं क्या बोलता, मेरी तो बहन थी। इतना मान-सम्मान पाकर मैं निहाल था। एक तरह से अपने आपको हीरो मानने लगा था। क्या ऐसी स्थिति में सच उगलना उचित होगा? क्या उसे बता देने के बाद मेरी ऐसी ही आवभगत कर पाएंगे ये लोग? जाहिर है, नहीं। तब कैसा लगेगा? सोचकर कुछ देर मन उचाट सा हो आया। मैं किसी भी कीमत पर उस सम्मान को नहीं खोना चाहता था, जो विवाह तय कराने से मुझे मिला था।

बहरहाल, मैंने बस में जो निश्चय किया था, उसी पर अटल रहा। चूंकि लडके वाले पहुंचे नहीं थे, सो मौका देख कर मैंने चाचा जी के दामाद को एक ओर बुला लिया। फिर उन्हें सच्चाई से अवगत कराया। मैं सोच रहा था कि सच्चाई जान कर वह बेहद आहत होंगे और शायद दो-चार बातें मुझे सुना भी दें लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह मुझसे ऐसे पेश आए, मानो यह एक सामान्य घटना हो और कुछ हुआ ही न हो। सच कहूं तो मुझे उनके आचरण पर अचरज हुआ। एक मैं हूं जो सोच-सोच कर हलकान हुआ जा रहा हूं और एक ये सज्जन हैं, जिन्हें कुछ फर्क ही नहीं पडा। वे इत्मीनान से बोले, 'देखिए, जो चल रहा है, उसे वैसे ही चलने दीजिए। अभी कुछ भी कहने-सुनने की जरूरत नहीं। सच कहूं तो लडकी के जीजा जी के मुंह से यह सुन कर बुरा लगा। लडके में इतना बडा ऐब है, फिर भी इनके लिए यह सामान्य बात है...। लडकी के शुभचिंतक हैं तो इतने बेफिक्र कैसे रह सकते हैं? तभी राकेश की नजर हम पर पडी तो उसने पूछा, 'कोई परेशानी तो नहीं? मानो उसने हमें चोरी करते रंगे हाथों पकड लिया हो। किसी तरह हमने बात रफा-दफा की। इसके बाद मेरी जिम्मेदारी खत्म थी। मैं आगे की व्यवस्था के लिए तैयार हो गया। लडके वालों को लडकी पसंद आ गई थी। उनके जाने के बाद चाचा बोले, 'आज ही लडके का रोका भी कर लेते हैं। शगुन में थोडे मेवे, फल, साडिय़ां और कपडे ही तो देने हैं। इधर लडका रोकने की रस्म हो रही थी, उधर चाचा के दामाद ने मुझे इशारे से कमरे के बाहर बुलाया। 'मैंने राकेश को सच बता दिया..., दामाद जी के मुंह से यह बात सुनकर मेरी जान में जान आई। अभी तक मैं इस गफलत में था कि कहीं उन्होंने मुझे यह बात न बताई तो आजन्म इसका दोष मेरे माथे चढेगा। तब मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा। उन्होंने आगे कहा, 'फिट का इलाज संभव है। रूपेश का इलाज भी करा देंगे, सब ठीक हो जाएगा। अब राकेश के मन में क्या चल रहा था, यह तो वही जाने। मैं होता तो इस रिश्ते से तुरंत इंकार कर देता लेकिन न जाने क्यों राकेश और चाचा जी को इसमें कुछ बुरा नहीं लगा। ....शादी हो गई। शुभि की शादी के 15 साल गुजर गए थे। इस बीच मैं भी घर-परिवार में इस कदर व्यस्त रहा कि दोबारा इलाहाबाद जाने का मौका नहीं मिला। एक बार अपनी शादी का न्यौता लेकर शुभि की ससुराल गया तो उसने सुबकते हुए कहा था, 'भैया, रूपेश को फिट आते हैं। यह सुन कर मन में खयाल आया कि कहीं चाचा के दामाद ने मुझसे झूठ तो नहीं बोला था कि उसने राकेश को सब कुछ बता दिया। सुबकती हुई शुभि ने मुझे अपराध-बोध से भर दिया। मैं इस गिल्ट से उबर नहीं पा रहा था। मुझे लगा कि मैंने शुभि व चाचा के भरोसे का कत्ल किया है। जरा सी नादानी ने एक मासूम लडकी की जिंदगी बर्बाद कर दी। काश कि मैं शुरुआत में ही सच बता देता। कई वर्षों के लगातार इलाज के बाद शुभि का एक बच्चा हुआ, जो छह महीने ही जीवित रहा। एक दिन खबर आई कि डायरिया से उसका इंतकाल हो गया। शुभि के आवास पर मेरी मुलाकात चाचा-चाची से हुई। उनका चेहरा उतरा हुआ था। जाहिर है, वे बेटी के गम से उबर नहीं पाए थे। मैं चाह कर भी उनसे नजरें मिला पाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। वजह वही अपराध-बोध था। पत्नी का दबाव था कि जो भी हो, खुल कर अपने मन की बात करना ताकि हमेशा के लिए इस गांठ से मुक्ति मिल जाए। गलत किया है तो प्रायश्चित भी करना होगा। ब्रह्मभोज के बाद सब चले गए तो मैंने चाचा-चाची को एकांत में बुलाया, 'चाचा, क्या आप सबको पता था कि रूपेश को फिट आता था? दोनों की नजरें झुकी हुई थीं। जाहिर था कि वे जवाब देने से कतरा रहे थे। बहुत कुरेदने के बाद बोले, 'हां पता था। इतना कहना भर था कि मुझे लगा, मानो मैंने एक बहुत बडी जंजीर से मुक्ति पा ली। ऐसी जंजीर, जिसने मेरा जीना मुहाल कर रखा था, जिसकी बेडिय़ों में जकड कर मैं वर्षों तक सो नहीं पाया था। हर वक्त मेरे सामने शुभि का सिसकता चेहरा होता। शुभि में मुझे मेरी बेटी का अक्स नजर आता। अगला सवाल मन में उभरा कि क्यों चाचा ने जान-बूझकर शुभि की शादी रूपेश से की। वह भरे मन से बोले, 'शुभि की बच्चेदानी में इन्फेक्शन था। डॉक्टर ने कहा था, वह कभी मां नहीं बन सकेगी। 'क्या यह शादी के पहले की बात है? 'हां...। यानी चाचा मुझसे भी दो कदम आगे निकले। शादी तय कराते समय मुझे यह बात नहीं बताई। जी किया कि जोर का ठहाका लगाऊं, मगर किस पर? खुद पर, चाचा पर या उस विधाता पर, जिसने यह अजीबोगरीब दुनिया रची है। झूठ दोनों ही ओर से बोला गया। मेरी बहन ने शायद मुझे सच ही बताया था कि रूपेश टेस्टट्यूब तकनीक से पिता बना था। अब इसे क्या कहें कि मुश्किल से जन्मा वह बच्चा भी न बचा।